
Bhairan Dham Protest: बिचून (जयपुर): आखिरकार 113वें दिन 'बिचून रीको भगाओ, भैराणाधाम बचाओ' आंदोलन बुधवार को सरकार और संत समाज के बीच सहमति के बाद स्थगित हो गया। दादू पीठाधीश्वर ओमप्रकाश दास महाराज के जन्मदिवस पर सुलह वार्ता के बाद भैराणा धाम संघर्ष समिति ने धरना-प्रदर्शन स्थगित करने की आधिकारिक घोषणा की।
बता दें कि जयपुर जिला कलक्टर संदेश नायक बुधवार शाम आंदोलन के सहमति वार्ता के लिए भैराणाधाम धरना स्थल पहुंचे और वहां मौजूद संतों के बीच सरकार की ओर से तैयार किया गया सहमति पत्र पढ़कर सुनाया। इसके बाद उन्होंने आमरण अनशन पर बैठे संतों को जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। लंबे संघर्ष विराम के बाद संतों और श्रद्धालुओं ने इसे आस्था एवं जनभावनाओं की बड़ी जीत बताया।
समझौते के संबंध में अतिरिक्त जिला कलक्टर युगांतर शर्मा ने बताया कि रीको क्षेत्र के लिए अब एक नवीन प्रस्तावित योजना तैयार की जाएगी, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। भैराणाधाम स्थित ऐतिहासिक अजमल दासजी की गुफा, दादू खोल, पारंपरिक परिक्रमा मार्ग तथा निजी खातेदारी भूमि से सटे हुए भूखंडों को 'हरित वन' के रूप में पूरी तरह विकसित करने का प्रस्ताव है। पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने के लिए वर्षा जल संरक्षण योजना को भी इस प्रोजेक्ट में विशेष रूप से शामिल किया जाएगा।
बताते चलें कि जयपुर के बिचून क्षेत्र स्थित 500 साल पुराने धार्मिक स्थल 'भैराणाधाम' को बचाने के लिए बड़ा जनआंदोलन देखने को मिला था। यहां रीको द्वारा प्रस्तावित औद्योगिक क्षेत्र का स्थानीय ग्रामीणों और साधु-संतों ने कड़ा विरोध किया था। पर्यावरण संरक्षण और आस्था की रक्षा के लिए राजस्थान के ‘ट्री मैन’ नाम से प्रसिद्ध समाजसेवी अमर भहड़ा के नेतृत्व में इस प्रस्ताव के खिलाफ मोर्चा खोला गया था।
इस विवाद का मुख्य कारण 40 हजार से अधिक हरे-भरे पेड़ों, जैव विविधता और प्राकृतिक जल स्रोतों पर मंडराता खतरा था। भहड़ा और ग्रामीणों की मांग थी कि औद्योगिक क्षेत्र को इस हरित भूमि के बजाय किसी बंजर स्थान पर स्थानांतरित किया जाए और भैराणा धाम के आसपास के वन क्षेत्र को 'संरक्षित क्षेत्र' घोषित किया जाए।
विरोध के दौरान दादू पंथी संत प्रकाश दास महाराज, रामरतन दास महाराज और देव जी महाराज सहित कई साधु-संतों ने 15 अप्रैल से अग्नि तप और आमरण अनशन शुरू कर दिया था। संतों द्वारा जिंदा समाधि लेने और हजारों श्रद्धालुओं के जयपुर कूच की चेतावनी देने के बाद प्रशासन हरकत में आया था।
लंबे चले इस आंदोलन और संतों के कड़े रुख के बाद अंततः सरकार और संतों के बीच सहमति बनी, जिसके तहत रीको क्षेत्र के लिए नवीन योजना तैयार करने और ऐतिहासिक गुफा व आसपास की भूमि को 'हरित वन' के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया गया था।