चिकित्सा विभाग में आरके जिला अस्पताल ही बायो मेडिकल वेस्टेज को खुले में आग के हवाले कर रहा है। इससे उठता धुआं मरीजों और बच्चों में संक्रमण के लिहाज से खतरनाक साबित हो सकता है।

अस्पताल के पीछे की तरफ तय स्थान के पास खुले में जैव चिकित्सा अपशिष्ट जलाया जा रहा था। वहां रखा कचरा पात्र व निस्तारण केंद्र पूरी तरह खाली पड़ा था।
जलते कचरे में दवाओं के पैकट व एक्सपायरी डेट की दवाओं सहित दूषित रुई, पट्टी आदि नजर आ रहीं थीं, जबकि इसके ठीक बगल में बच्चों का वार्ड व प्रसूता वार्ड है। कचरे से निकलता धुआं खुली खिड़की से अस्पताल के अंदर जा रहा था।
जैव चिकित्सा अपशिष्ट का निस्तारण ठीक से हो रहा है या नहीं, इसकी निगरानी का जिम्मा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व हेल्थ सोसायटी का होता है। इसमें बायोवेस्ट संधारण करने वाले संचालक को एक प्रपत्र दिया जाता है, जिसमें दर्ज करना होता है कि किस अस्पताल से, किस तारीख को कितना लाल, पीला, नीला और काला बायोवेस्ट आया। किस गाड़ी से एक दिन में कितना वेस्टेज आया? कितना निस्तारित किया गया? कितने को जलाया गया? कितने को केमिकल वॉश किया? कितने को गाड़ा गया। गौरतलब है कि ऑपरेशन के दौरान निकलने वाले मांस के टुकड़े, अंग या ऐसे कचरे को भूमि के अंदर गाड़ा जाता है, जबकि अन्य कचरे को उच्च ताप पर सुरक्षित तरीके से जलाया जाता है।
15 हजार रुपए महीने का खर्च
राजसमंद जिले के अस्पतालों से निकलता बायोवेस्ट उदयपुर की सीटीएफ कनेक्टीविटी नामक संस्था संग्रहित कर ले जाती है। प्रतिबेड 100 रुपए महीने का खर्चलिया जाता है। आरके अस्पताल में 150 बेड के अनुसार 15 हजार रुपए प्रतिमाह इस पर खर्च हो रहे हैं।
बायो मेडिकल वेस्टेज में सीरिंज, खून से सनी रुई व पट्टियां, ऑपरेशन के दौरान निकाले शरीर के अंग, प्रसव के दौरान खराब हुई रुई व कपड़े, दवाइयों के रैपर, प्लास्टर आदि। चार रंग के डिब्बों में इसे संग्रहित किया जाता है। लालरंग के डिब्बे में मुख्यत: प्लास्टिक आयटम, जिसमें थैली से लेकर दवाओं के प्लास्टिक के खाली डिब्बे, ग्लूकोज की खाली बोतलें आदि डाली जाती हैं। पीले रंग का डिब्बा अधिक महत्वपूर्ण होता है, जिसमें ऑपरेशन के दौरान निकाले गए अंग, खराब रुई, ब्लड, मवाद से सनी पट्टियां आदि होती हैं। नीले रंग के डिब्बे में नुकीला कचरा डाला जाता है, जैसे कांच का इंजेक्शन, सुई वहीं नीली और काली में भी कचरा डाला जाता है।