
Bisalpur Project Delay: जयपुर शहर की प्यास का सबसे बड़ा कारण पानी की कमी नहीं, बल्कि प्लानिंग की कमी बनती जा रही है। वर्ष 2009 में बीसलपुर पाइपलाइन से 2021 तक की आबादी की जरूरतों के हिसाब से सप्लाई शुरू हुई थी, जो अब 2026 की आबादी का बोझ ढो रही है। नई लाइन की तैयारी 2015 में शुरू होनी थी, लेकिन जिम्मेदार विंग की नींद एक दशक बाद खुली। अब हालात ऐसे हैं कि पाइप फट रहे हैं और हर शटडाउन के साथ लाखों लोगों की प्यास बढ़ रही है। बीसलपुर डेम में पर्याप्त पानी होने के बावजूद जयपुर शहर के कई इलाकों में पेयजल संकट के गंभीर हालात बन रहे हैं।
बीसलपुर डेम की अब 17 साल पुरानी लाइन 33 लीकेज के जख्म लेकर कराह रही है। स्थिति यह है कि पांच साल में बढ़ी अतिरिक्त आबादी की पेयजल जरूरतों को पूरा करने के लिए जैसे ही लाइन से पानी का दबाव बढ़ाया जाता है, वैसे ही लाइन के 33 लीकेज जख्म की तरह हरे हो उठते हैं। विंग लीकेज दुरुस्त करने के लिए शटडाउन लेती है और शहर 24 से 72 घंटे तक प्यासा रहने की स्थिति में आ जाता है।
सूरजपुरा में 205 करोड़ की लागत से 216 एमएलडी क्षमता का फिल्टर प्लांट और रेनवाल में इंटरमीडिएट पंपिंग स्टेशन भी बनाया गया। तब विंग के अधिकारियों ने दावा किया था कि इंटरमीडिएट पंपिंग स्टेशन से मौजूदा लाइन से ज्यादा पानी लिया जा सकेगा और लाइन पर दबाव भी नहीं आएगा। लेकिन अधिकारियों के दावों के विपरीत 216 एमएलडी क्षमता वाला फिल्टर प्लांट और रेनवाल इंटरमीडिएट पंपिंग स्टेशन भी फेल साबित हुआ। ऐसे में 205 करोड़ रुपए का निवेश भी बेअसर नजर आ रहा है।
105 किलोमीटर लंबी है सूरजपुरा से बालावाल तक बिछी लाइन।
2009 में शुरू हुई थी बीसलपुर सिस्टम से शहर में सप्लाई।
17 साल पुरानी हो चुकी है मौजूदा 2300 एमएम की लाइन।
1100 करोड़ की जगह 1800 करोड़ तक पहुंची नई लाइन बिछाने की लागत।
जयपुर शहर में बीसलपुर जलापूर्ति शुरू होने के बाद निशुल्क वितरण वाले सरकारी टैंकरों पर निर्भरता को लगभग खत्म करने का दावा किया गया था। लेकिन 15 साल बाद भी सरकारी टैंकर व्यवस्था जस की तस है। शहर के कई इलाकों में तो टैंकरों से ही पेयजल वितरण ही मुख्य पेयजल स्त्रोत बन रहा है। वहीं टैंकर वितरण व्यवस्था की खामियों के कारण जरूरतमंद लोगों को ही शहर में पानी के लिए भटकना पड़ रहा है।