Rajasthan Politics: राजस्थान में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने मंत्रिमंडल विस्तार को हरी झंडी दे दी है।
Rajasthan Politics: राजस्थान में मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने मंत्रिमंडल विस्तार को हरी झंडी दे दी है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के हाल के दिल्ली दौरे और पार्टी के केंद्रीय नेताओं के साथ उनकी मुलाकातों ने इस संभावना को और बल मिला है। माना जा रहा है कि जल्द ही राजस्थान में मंत्रिमंडल का विस्तार होगा, जिसमें 6 नए मंत्रियों को शामिल किया जा सकता है। वहीं, मंत्रिमंडल के विस्तार के साथ-साथ फेरबदल की भी संभावना जताई जा रही है।
बता दें, इस विस्तार में सभी गुटों के नेताओं को जगह देकर पार्टी गुटबाजी को खत्म करने और सरकार को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
दरअसल, राजस्थान में बीजेपी सरकार को बने 20 माह हो चुके हैं। अब मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चा जोर पकड़ रही है। सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पिछले 24 दिनों में तीन बार दिल्ली का दौरा किया है। इन दौरों में उन्होंने बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष और अन्य शीर्ष नेताओं से मुलाकात की।
माना जा रहा है कि इन मुलाकातों में मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल को लेकर अहम मंत्रणा हुई है। आलाकमान के साथ अंतिम चर्चा के बाद जल्द ही विस्तार की घोषणा हो सकती है।
सूत्रों का कहना है कि उपराष्ट्रपति चुनाव और राजस्थान विधानसभा के आगामी सत्र के पहले मंत्रिमंडल विस्तार और फेरबदल पर अंतिम मुहर लग सकती है। विशेष रूप से विधानसभा के मानसून सत्र के पहले होने की संभावना है। वहीं, ये भी जानकारी है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का एक और दिल्ली दौरा संभव है, जिसमें वे शीर्ष नेताओं के साथ मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले नामों पर अंतिम विचार-विमर्श करेंगे।
हाल ही में छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया है। उन्होंने तीन नए मंत्रियों को शामिल कर 15 प्रतिशत के मंत्रिमंडल कोटे को पूरा किया। छत्तीसगढ़ में इस विस्तार में किसी भी मौजूदा मंत्री को हटाया नहीं गया, बल्कि तीनों नए चेहरों (पहली बार के विधायक) को मौका दिया गया। राजस्थान में भी इसी फॉर्मूले को अपनाए जाने की संभावना है।
संभावना जताई जा रही है कि राजस्थान में पहली बार के विधायक या दूसरी बार के विधायकों को मौका दिया जा सकता है, क्योंकि दूसरी बार के विधायकों को अभी तक मौका नहीं मिला है, इसकी वजह पिछली बार प्रदेश में कांग्रेस की सरकार होना है। वहीं, इसके अलावा राजस्थान में मौजूदा मंत्रियों में से कुछ की परफॉर्मेंस के आधार पर छुट्टी भी हो सकती है।
बता दें, राजस्थान विधानसभा में कुल 200 सीटें हैं, जिनमें से 15 प्रतिशत यानी अधिकतम 30 मंत्री बनाए जा सकते हैं। वर्तमान में भजनलाल सरकार में मुख्यमंत्री सहित 24 मंत्री हैं। ऐसे में 6 नए मंत्रियों को शामिल करने की गुंजाइश है। बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने हाल ही में संकेत दिए थे कि कुछ मंत्रियों को संगठन में जिम्मेदारी दी जा सकती है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि मौजूदा मंत्रियों में से कुछ को हटाकर विस्तार किया जाएगा।
बीजेपी नेतृत्व इस मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर सतर्क रुख अपना रहा है। पार्टी चाहती है कि विस्तार में सभी गुटों- खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के समर्थकों को उचित प्रतिनिधित्व मिले। इसका उद्देश्य सरकार के शेष कार्यकाल में गुटबाजी को खत्म करना और एकजुट होकर प्रदेश के विकास के लिए काम करना है।
बता दें, पिछले कुछ महीनों में हुई राजनीतिक नियुक्तियों में भी इस संतुलन को देखा जा सकता है। सरकार ने संघ के करीबी माने जाने वाले पूर्व बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी को राज्य वित्त आयोग का चेयरमैन नियुक्त किया। वहीं, वसुंधरा राजे गुट के नेता और पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी को तिरंगा यात्रा और विभाजन विभीषिका अभियान का संयोजक बनाया गया।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की लगातार दिल्ली यात्राओं और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की पीएम मोदी से मुलाकात सहित अन्य वरिष्ठ नेताओं की दिल्ली में बढ़ती सक्रियता ने मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलों को और हवा दी है। बीजेपी को 2023 के विधानसभा चुनाव में राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में पूर्ण बहुमत मिला था। तीनों राज्यों में सरकार गठन के बाद छत्तीसगढ़ ने सबसे पहले मंत्रिमंडल विस्तार किया, जिससे राजस्थान में भी इसकी संभावना बढ़ गई है।
सूत्रों के अनुसार, मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले नए चेहरों के चयन में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन को भी ध्यान में रखा जाएगा। पार्टी नेतृत्व उन नेताओं को प्राथमिकता दे सकता है, जिन्होंने संगठन में लंबे समय तक काम किया हो या जिनका क्षेत्र में मजबूत जनाधार हो। साथ ही, युवा और अनुभवी नेताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश होगी।