
जयपुर. भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकारण की ओर से हाल ही जारी हुई गाइड लाइन के तहत शहर में बर्फ फैक्ट्री मालिकों को खाद्य सुरक्षा विभाग ने इस संबंध में नोटिस जारी किए हैं। इसके तहत अब खाने योग्य (एडिबल) बर्फ बनाने वाली फैक्ट्रियों को भी लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा। वहीं अखाद्य (नॉन एडिबल) बर्फ बनाने वालों को बर्फ बनाने में तय मात्रा में नीले रंग का प्रयोग करना होगा। गौरतलब है कि शहर में गर्मी में खपने वाली 100 टन में से खाने योग्य बर्फ 10 टन ही होती है। यह दुकानों पर शेक, ज्यूस, शिकंजी, गन्ने के ज्यूस और होटलों में इस्तेमाल होती है। पहचान न होने के कारण औद्योगिक क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाली अखाद्य बर्फ को भी खाने योग्य बताकर बेचा जा रहा है। अखाद्य बर्फ का इस्तेमाल दवाओं को ठंडा रखने, मांस व सी फूड के प्रिजर्वेशन, शव गृह, सीमेंट फैक्ट्रीज व अन्य कैमिकल फैक्ट्रियों में होता है।
यह करना होगा
खाने योग्य बर्फ तैयार करने वाले फैक्ट्री मालिकों को लाइसेंस लेना होगा। दो हजार किलो तक प्रतिदिन बर्फ तैयार करने वाले फैक्ट्री मालिकों को स्टेट लाइसेंस का प्रावधान है। इससे ज्यादा के उत्पादन में मालिकों को सेंट्रल लाइसेंस के लिए आवेदन करना होगा। अखाद्य बर्फ की पहचान के लिए इस्तेमाल में नीला रंग करना अनिवार्य है। यदि अखाद्य बर्फ नीली नहीं मिली तो 2 लाख रुपए जुर्माना व 6 माह की सजा का प्रावधान है।
आंतरिक रोग विशेषज्ञ डॉ. विपुल खंडेलवाल ने बताया कि अखाद्य बर्फ मुख्य तौर पर दूषित पानी ही है। इसके इस्तेमाल से गले में संक्रमण, टायफाइड बुखार और उल्टी-दस्त की समस्या हो सकती है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी जयपुर प्रथम डॉ. नरोत्तम शर्मा ने बताया कि शहर की एडिबल और नॉन एडिबल आइस तैयार करने वाली फैक्ट्रियों को लाइसेंसिंग के लिए नोटिस दिए गए हैं। इससे एडिबल व नॉन एडिबल दोनों तरह की बर्फ की पहचान हो सकेगी।