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Rajasthan : ‘पत्नी की निजी जानकारी के लिए RTI लगाना मानसिक क्रूरता’, राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan : राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में पत्नी की मेडिकल स्थिति और वेतन से जुड़ी निजी जानकारी जुटाने के लिए बार-बार आरटीआई आवेदन करने को मानसिक क्रूरता माना है।
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जयपुर

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Sanjay Kumar Srivastava

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Updated: 1 Nov 2026, 4:36 PM IST

rajasthan high court verdict wife personal information rti mental cruelty

Rajasthan : फाइल फोटो पत्रिका।

Rajasthan : जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में पत्नी की मेडिकल स्थिति और वेतन से जुड़ी निजी जानकारी जुटाने के लिए बार-बार आरटीआई आवेदन करने को मानसिक क्रूरता माना है। फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी के पक्ष में दिए गए तलाक के फैसले को बरकरार रखा है और इसके खिलाफ पति द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया है। न्यायाधीश इंद्रजीत सिंह और न्यायाधीश संगीता शर्मा की खंडपीठ ने सहकर्मियों के साथ संबंधों के निराधार आरोप लगाना, एटीएम कार्ड अपने पास रखकर वेतन निकालना और गर्भावस्था के दौरान उचित देखभाल नहीं करने को भी मानसिक और शारीरिक क्रूरता के दायरे में मानते हुए अधीनस्थ कोर्ट के फैसले को सही माना।

तलाक को पति ने हाईकोर्ट में दी थी चुनौती

जेवीवीएनएल में सहायक अ​भियंता के पद पर कार्यरत विवाहिता ने फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी दाखिल की थी। उसने कहा कि विवाह के बाद से ही उसे प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। गर्भावस्था के दौरान उसे ठीक से भोजन और उचित देखभाल नहीं दी गई। इसके अलावा पति उसके सहकर्मियों के साथ अनुचित संबंधों के झूठे आरोप लगाता था, मारपीट करता था, उसका एटीएम कार्ड अपने पास रखकर पूरा वेतन खुद निकाल लेता था और उसके विभाग में आरटीआई लगाकर उसकी निजी जानकारियां जुटाता था ताकि उसकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई जा सके। फैमिली कोर्ट ने 29 अप्रैल 2024 को पत्नी के पक्ष में तलाक की डिक्री पारित की थी, जिसे पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

…जो मानसिक क्रूरता है

राजस्थान हाईकोर्ट ने माना कि पति द्वारा पत्नी की मेडिकल स्थिति, वेतन और अन्य व्यक्तिगत मामलों की जानकारी हासिल करने के लिए लगातार आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन करना तथा पुलिस एवं उच्च अधिकारियों को शिकायतें भेजना पत्नी की प्रतिष्ठा को विभाग में नीचा दिखाने के उद्देश्य से किया गया था, जो मानसिक क्रूरता है।

फैमिली कोर्ट का निर्णय पूरी तरह उचित और न्यायसंगत - राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने गर्भकाल के दौरान पत्नी की देखभाल न करने और उसे ठीक से भोजन उपलब्ध न कराने के कृत्य को भी गलत ठहराया। खंडपीठ ने इस तथ्य पर विशेष जोर दिया कि दोनों पक्ष वर्ष 2018 से अलग रह रहे हैं और उनके बीच वैवाहिक बंधन पूरी तरह टूट चुका है तथा पुनर्मिलन की कोई वास्तविक संभावना नहीं बची है। ऐसे में उन्हें जबरन साथ रहने के लिए बाध्य करना दोनों के लिए क्रूरता होगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट द्वारा साक्ष्यों के आधार पर लिया गया निर्णय पूरी तरह उचित और न्यायसंगत है।