रूस-यूक्रेन युद्ध से यूरोप की राजनीति, ऊर्जा और सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ा है। पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री और पूर्व संसद स्पीकर राडोस्लाव सिकोरस्की ने कहा कि यह संघर्ष यूरोप के गठबंधनों, रक्षा खर्च और रणनीतिक सोच को बदल रहा है।
पोलैंड के उप प्रधानमंत्री और पूर्व संसद स्पीकर राडोस्लाव सिकोरस्की ने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की सुरक्षा, विदेश नीति और रणनीतिक सोच को गहराई से प्रभावित किया है। उन्होंने कहा कि पुतिन ने यूक्रेन पर हमले को सिर्फ तीन दिन का "स्पेशल ऑपरेशन" माना था, लेकिन यह संघर्ष लंबे युद्ध में बदल गया और इसका आर्थिक, सैन्य व मानवीय असर आज पूरे यूरोप में महसूस किया जा रहा है। राडोस्लाव सिकोरस्की
सिकोर्स्की जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल (JLF) 2026 के चौथे दिन ‘A Continent in Crisis: Russia, Ukraine and the European Story’ सत्र में बोल रहे थे। सत्र का संचालन भारत के पूर्व राजदूत नवतेज सरना ने किया और कार्यक्रम राजस्थान पत्रिका के सहयोग से आयोजित हुआ।
राडोस्लाव सिकोरस्की कहा कि रूस को इस युद्ध में भारी आर्थिक नुकसान हुआ है और "हर साल अरबों डॉलर युद्ध पर खर्च हो रहे हैं", जबकि प्रतिबंधों ने रूसी अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है। उन्होंने बताया कि यूक्रेन में हजारों लोग मारे गए, कई शहर नष्ट हो गए और नागरिक कड़ाके की ठंड में बिजली व हीटिंग के बिना जीवन जीने को मजबूर हुए।
राडोस्लाव सिकोरस्की ने कहा कि यह संघर्ष जमीन का विवाद नहीं बल्कि "यूक्रेन की भू-राजनीतिक दिशा तय करने की लड़ाई" है। उन्होंने रूस पर उपनिवेशवादी नैरेटिव को बढ़ावा देने का आरोप लगाया और कहा कि भाषा या जातीय समानता राजनीतिक सोच तय नहीं करती। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रूस का विकास केंद्रीकृत सत्ता के तहत हुआ, जबकि यूक्रेन पोलिश-लिथुआनियन कॉमनवेल्थ जैसे लोकतांत्रिक ढांचे से प्रभावित रहा। उन्होंने सोवियतकालीन कृत्रिम अकाल ‘होलोडोमोर’ को यूक्रेनी पहचान पर हमले का हिस्सा बताया।
यूरोपीय सुरक्षा पर बोलते हुए राडोस्लाव सिकोरस्की ने कहा कि अब यूरोप अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकता। उनके मुताबिक कई यूरोपीय देशों ने रक्षा बजट में बढ़ोतरी की है और पोलैंड जीडीपी का 3.5% रक्षा पर खर्च कर रहा है। उन्होंने दावा किया कि पोलैंड यूक्रेन को लड़ाकू विमान देने वाले शुरुआती देशों में शामिल रहा है। उन्होंने बताया कि लाखों यूक्रेनी शरणार्थियों ने पोलैंड में शरण ली है, जिससे सामाजिक और आर्थिक दबाव बढ़ा है, लेकिन मानवीय आधार पर सहायता जारी है।
राडोस्लाव सिकोरस्की ने कहा कि यूक्रेन ने सोवियत विघटन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा परमाणु भंडार छोड़ा था और बदले में उसकी संप्रभुता व सीमाओं की सुरक्षा की गारंटी दी गई थी, लेकिन आज उन्हीं सीमाओं का उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने कहा, "यह अंतरराष्ट्रीय भरोसे और सुरक्षा वादों के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।"
अमेरिका और यूरोप के रिश्तों पर उन्होंने कहा कि डोनाल्ड ट्रंप के दौर ने यूरोप को अधिक आत्मनिर्भर बनने और अपनी रक्षा क्षमता मजबूत करने पर मजबूर किया। उनके अनुसार यूक्रेन युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि “स्थायी शांति का भ्रम टूट चुका है” और भविष्य में लोकतंत्र, सहयोग और प्रतिरोध ही स्थिरता की गारंटी होंगे।
राडोस्लाव सिकोरस्की ने रूस-चीन समीकरण पर भी चिंता जताई। उनके अनुसार रूस तकनीक, उद्योग और वित्त में चीन पर निर्भर होता जा रहा है, जो दीर्घकाल में रूस के लिए खतरा है, खासकर फार ईस्ट जैसे क्षेत्रों में। उन्होंने यह भी कहा कि रूस उत्तर कोरिया के साथ सैन्य सहयोग बढ़ा रहा है। ऊर्जा की दृष्टि से देखें तो युद्ध के कारण यूरोप को गैस और तेल की आपूर्ति के नए स्रोत ढूंढने पड़े और सैन्य व आर्थिक प्राथमिकताओं में बदलाव आया है।
भारत को लेकर उन्होंने कहा कि उसकी विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है और बहुध्रुवीय अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में भारत एक अहम खिलाड़ी बनकर उभरा है। उनके अनुसार भारत रूस और पश्चिम-दोनों से संवाद की स्थिति में है और उसकी भूमिका आने वाले वर्षों में और महत्वपूर्ण होगी।
राडोस्लाव सिकोरस्की ने कम्युनिस्ट पोलैंड में जीवन, ब्रिटेन में निर्वासन, ऑक्सफोर्ड में PPE की पढ़ाई और अफगान युद्ध की रिपोर्टिंग जैसे अपने निजी अनुभव भी साझा किए। राडोस्लाव सिकोरस्की ने बताया कि वे कम्युनिस्ट पोलैंड में पले-बढ़े, बाद में ऑक्सफोर्ड में PPE (Philosophy, Politics & Economics) की पढ़ाई की, जहां उनके साथ बोरिस जॉनसन और डेविड कैमरन जैसे लोग भी थे। उन्होंने कहा कि पिछले 35 वर्ष पोलैंड के इतिहास के सबसे सफल रहे हैं, जब देश गरीब राष्ट्र से निकलकर ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बना और पहली बार G20 में आमंत्रित हुआ।