राजस्थान में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए कई वरिष्ठ नेता पार्टी और सरकार में नजरअंदाज किए जा रहे हैं, जिससे वे असमंजस में हैं और उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में दिख रहा है।
जयपुर: राजस्थान में पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए कई वरिष्ठ नेताओं के लिए पाला बदलने का फैसला अब भारी पड़ता नजर आ रहा है।
पार्टी में शामिल होने के बाद न तो इन्हें संगठन में कोई अहम जिम्मेदारी मिली और न ही सरकार के कामकाज में इनकी कोई खास भूमिका दिख रही है। इससे इन नेताओं के राजनीतिक भविष्य पर सवाल खड़े हो गए हैं।
भाजपा में शामिल होने के वक्त इन नेताओं को उम्मीद थी कि उन्हें पार्टी और सरकार में सम्मानजनक स्थान मिलेगा, लेकिन हकीकत इससे उलट साबित हो रही है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, आंतरिक गुटबाजी और प्राथमिकताओं की राजनीति के चलते अधिकांश नेता केवल नाम मात्र के लिए पार्टी में रह गए हैं।
पूर्व जयपुर महापौर ज्योति खंडेलवाल इसका बड़ा उदाहरण हैं। उन्होंने 2019 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा था और 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा जॉइन की।
शुरुआत में उनका नाम संगठन में संभावित पदों की एक वायरल सूची में जरूर आया, लेकिन पार्टी के अंदरूनी समीकरण उनके रास्ते में आ गए। नतीजतन, उन्हें अब तक कोई औपचारिक जिम्मेदारी नहीं मिल पाई है और उनकी राजनीतिक सक्रियता भी काफी कम हो गई है।
इसी तरह, पूर्व कैबिनेट मंत्री लालचंद कटारिया ने 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा का दामन थामा। हालांकि, उन्होंने न तो चुनाव टिकट की मांग की और न ही पार्टी संगठन में कोई भूमिका निभाने की कोशिश की। राजनीति से उनकी दूरी ने यह साफ कर दिया है कि भाजपा में आने के बाद उनका कद पहले जैसा नहीं रहा।
राजस्थान के पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय ने भी भाजपा से इस्तीफा देकर कांग्रेस में वापसी की है। 2024 के लोकसभा चुनावों में बांसवाड़ा की बागीदौरा सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले मालवीय को बीएपी प्रत्याशी राजकुमार रोत से हार का सामना करना पड़ा था।
मालवीय ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर कहा कि भाजपा की सरकार में रहते हुए भी वह जनता के काम नहीं करवा पाए। गरीबों की कोई सुनवाई नहीं हो रही। मनरेगा भुगतान अटके हैं और किसानों को खाद नहीं मिल रही।
उन्होंने स्वीकार किया कि कांग्रेस छोड़ना उनकी बड़ी भूल थी। मालवीय ने कहा कि उन्होंने 40 साल कांग्रेस में काम किया है और अब आत्ममंथन के बाद वापस लौटने का फैसला किया है।
कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे राजेन्द्र सिंह यादव की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा में शामिल हुए यादव पहले से ही प्रवर्तन एजेंसियों की जांच का सामना कर चुके थे। बाद में उनके बेटों पर मिड-डे मील घोटाले के आरोप लगने से उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं। इससे भाजपा में उनके लिए कोई मजबूत राजनीतिक जमीन बनती नजर नहीं आई।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, 2023-24 के दौरान कांग्रेस के 20 से ज्यादा वरिष्ठ नेता भाजपा में शामिल हुए थे, लेकिन पूर्व नागौर सांसद ज्योति मिर्धा को छोड़ दें तो ज्यादातर नेताओं को न तो संगठन में अहम जिम्मेदारी मिली और न ही सरकार में कोई भूमिका। इससे यह धारणा मजबूत हो रही है कि पाला बदलना अब राजनीतिक तरक्की की गारंटी नहीं रहा।
इस बीच, कांग्रेस भी अपने यहां से गए नेताओं को लेकर मंथन कर रही है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि अनुशासन समिति उन नेताओं के मामलों की समीक्षा कर रही है, जो वापसी के इच्छुक हो सकते हैं। अंतिम फैसला पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व करेगा। कुल मिलाकर भाजपा में शामिल हुए ये नेता असमंजस की स्थिति में हैं और उनका भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है।