उन्होंने 20 घंटे में जो महसूस किया वह यह है कि ईरान बातचीत के जरिए वह पाना चाहता है जो युद्ध में नहीं पा सका।
डॉ. रहीस सिंह, अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार - डॉनल्ड ट्रंप, उनकी मीडिया और पाकिस्तानी शाहबाजों ने बड़े जोर-शोर से प्रचार किया था कि पाकिस्तान मध्य पूर्व में शांति लाने जा रहा है। लेकिन हुआ क्या? दुनिया ने देखा कि इस्लामाबाद में मध्य पूर्व में शांति लाने के लिए 20 घंटे तक चली बातचीत अंतत: बेनतीजा खत्म हो गई। इसके बाद अमरीका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और पूरा प्रतिनिधिमंडल वापस लौट चुका है। प्रश्न यह उठता है कि यह असफलता किसकी है? अमरीका की या व्यक्तिगत तौर पर जेडी वेंस की अथवा पाकिस्तान की जिसका मैनेजमेंट बेहद कमजोर रहा। प्रश्न यह भी है कि अब आगे क्या होगा? सीजफायर कितने दिन तक रह पाएगा? वेंस ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा कि ईरान किसी भी शर्त को मानने को तैयार नहीं था। इस तरीके से बात नहीं हो सकती। उन्होंने 20 घंटे में जो महसूस किया वह यह है कि ईरान बातचीत के जरिए वह पाना चाहता है जो युद्ध में नहीं पा सका।
मतलब साफ है कि सीजफायर अब दबाव में है। ऐसा क्यों है, यह समझना आवश्यक है। दरअसल अमरीका की आतंरिक राजनीति दो सिरों पर काम कर रही है। एक सिरे पर ट्रंप हैं जो युद्ध के जरिए अंतिम परिणाम तक जाना चाहते थे। हालांकि उनके सलाहकारों और विशेषज्ञों द्वारा पहले ही बता दिया गया था कि युद्ध और नेतृत्व परिवर्तन का उद्देश्य एक साथ लेकर चलना खतरनाक होगा। लेकिन इस पूरे युद्ध में अमरीका इजराइल की कठपुतली की तरह नजर आया। इस पूरे युद्ध के दौरान और उससे पहले ऐसा लगता रहा कि निर्णय इजराइल का है और अमरीका उसे फॉलो कर रहा है। ऐसी स्थिति पहली बार दिखी अन्यथा इससे पहले निर्णय अमरीका भी लेता रहा है। हां, इजराइल को बचाना अमरीका की जिम्मेदारी भी रही है और जरूरत भी। यही कारण है कि जिस सिरे पर ट्रंप खड़े थे वह विफल होता नजर आया। हालांकि एक बात यहां ध्यान रखनी आवश्यक है, वह यह कि अमरीका ने ईरान के ऑयल इंफ्रास्ट्रक्चर को अत्यधिक हानि पहुंचाई लेकिन दुनिया के अंदर जो नैरेटिव बना वह इसके ठीक उल्टा है। नैरेटिव में ट्रंप हार गए। यही स्थिति अमरीका की आंतरिक राजनीति में विरोधाभास पैदा कर गई जिसके दूसरे सिरे पर उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और डीएनआइ (डायरेक्टर ऑफ नेशनल इंटेलिजेंस) तुलसी गबार्ड सहित कई रिपलिकन्स थे जो चाहते थे मध्य पूर्व में शांति स्थापित हो। मध्य पूर्व में सीजफायर और उसके बाद इस्लामाबाद में बैठक इसी का नतीजा है। लेकिन अब बातचीत खत्म हो चुकी है, वह भी बेनतीजा इसलिए अब दूसरे सिरे पर खड़े वेंस, गबार्ड और अन्य अमरीका के अंदर तो ट्रंप के मुकाबले कमजोर साबित हो गए हैं। अब ट्रंप का निर्णय क्या होगा यह देखने वाली बात होगी। इसी पर मध्य पूर्व की दिशा भी निर्भर करेगी। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस अब तक ईरान संकट के समाधान के लिए लीड रोल निभा रहे थे। उन्होंने पाकिस्तान में ईरानी ऑफिशियल्स के साथ हाई-लेवल वार्ता शुरू की, जो कई दशकों में अपनी तरह की पहली डायरेक्ट एंगेजमेंट थी। जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि वेंस इस युद्ध के खिलाफ थे, लेकिन अब वार्ता बेनतीजा खत्म होने के बाद ट्रंप बार-बार अपने ट्रुथ सोशल पर ईरान को धमका रहे हैं, इसके दो परिणाम हो सकते हैं। पहला जेडी वेंस की पकड़ रिपब्लिकन पार्टी में कमजोर होगी। स्वाभाविक है कि ट्रंप के ऊपर पडऩे वाला आंतरिक दबाव घटेगा। अगर वेंस कमजोर हुए तो ट्रंप की स्वीकार्यता बढ़ेगी। फिर तो यह भी संभव है कि ट्रंप सीज फायर को तोड़ दें और निर्णायक युद्ध में कूद जाएं। लेकिन ऐसी हालत में एक सवाल यह भी उभरता है कि युद्ध अगर और लंबा खींचा या ट्रंप स्टेट ऑफ होर्मुज को नहीं खुलवा पाए तो? तब जो परिस्थितियां बनेंगी वे पूरी दुनिया को कभी न खत्म होने वाले संकट में धकेल देंगी। क्या दुनिया इसे झेल पाएगी?
दरअसल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इस पूरे संकट का सबसे क्रिटिकल चोक पॉइंट बन चुका है। ईरान की ब्लॉकेड से ग्लोबल ऑयल सप्लाई पर सीधा असर पड़ा है। एनर्जी प्राइसेज बढऩे लगे हैं, जिससे पूरी दुनिया में इन्फेलेशन का दबाव बढ़ रहा है। इस स्थिति ने अमरीकी प्रशासन पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। ऐसा कहना इसलिए तर्कसंगत हैं, क्योंकि घरेलू अर्थव्यवस्था और इलेक्शन दोनों इससे प्रभावित हो रहे हैं। यह घटना दिखाती है कि कैसे एक सकरा सा समुद्री मार्ग पूरी ग्लोबल इकोनॉमी का गला घोंट सकता है। जो भी हो आज का सच यह है कि युद्ध अब केवल युद्ध के मैदान में नहीं लड़ा जा रहा है, उसके प्रभाव शहरों से कस्बों और कस्बों से जिंदगियों पर पड़ रहे हैं।