ऐसे में सवाल यह है कि क्या हमारे पास इसे सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त कानून है? फिलहाल स्पष्ट नियमों की कमी दिखाई देती है।
डॉ. अश्विनी पाराशर, बाल रोग विशेषज्ञ (पीजीआइ चंडीगढ़)- कल्पना कीजिए, किसी शहर का ऐसा नक्शा जिसमें हर गली, हर तार, हर कोना दर्ज हो, और उसे देखकर कोई पहले से बता सके कि कहां आग लगेगी या कहां जाम होगा। विज्ञान आज ठीक ऐसा ही मानव मस्तिष्क के साथ करने की कोशिश कर रहा है, इसे कहते हैं ब्रेन मैपिंग। यह सिर्फ प्रयोगशाला का काम नहीं, बल्कि उस सवाल का जवाब खोजने की कोशिश है कि हम सोचते कैसे हैं? हम बीमार क्यों पड़ते हैं? और सबसे बड़ा—हम हैं कौन? बचपन में सुना जुमला 'बड़े होकर समझदार बनोगे' अब वैज्ञानिक आधार पा चुका है। समझदारी उम्र के साथ अपने आप नहीं आती, बल्कि इसके पीछे दिमाग में होने वाली एक गहरी जैविक प्रक्रिया काम करती है। इसी प्रक्रिया को समझने के लिए विज्ञान ने मस्तिष्क का अध्ययन शुरू किया है। मानव मस्तिष्क में लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं और इनके संबंध बेहद जटिल होते हैं। ब्रेन मैपिंग इन्हीं कनेक्शनों को समझने और रेकॉर्ड करने की प्रक्रिया है।
यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिल्वेनिया के न्यूरोसाइंटिस्ट जैकब ए. साइडलिट्ज और उनकी टीम ने 3,500 से अधिक लोगों के दिमाग के स्कैन का विश्लेषण किया। उन्होंने दिखाया कि उम्र के साथ दिमाग के हिस्सों के बीच 'बातचीत' बदलती रहती है। बचपन में यह जुड़ाव लचीला होता है, किशोरावस्था में संतुलन अस्थिर रहता है और व्यस्कता में यही जुड़ाव मजबूत हो जाते हैं। वैज्ञानिक इस बदलाव को तीन हिस्सों में संवेदना, निर्णय और भावना के संतुलन के रूप में समझते हैं। भारत में आइआइटी और एम्स जैसे संस्थान इस शोध में सक्रिय हैं और इससे अल्जाइमर व पार्किंसन जैसी बीमारियों को समझने में मदद मिल सकती है।
जब इस समझ को अपराध जांच में आजमाया गया तो भारत में नार्को टेस्ट और ब्रेन मैपिंग का उपयोग हुआ लेकिन २०१० में सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट किया कि बिना सहमति ऐसे परीक्षण नहीं किए जा सकते। दिमाग हर व्यक्ति में अलग तरह से प्रतिक्रिया करता है, इसलिए सिर्फ दिमागी गतिविधि के आधार पर सच-झूठ तय करना जोखिम भरा है। जैसे-जैसे तकनीक दिमाग की गतिविधियों को पढऩे के करीब पहुंच रही है, 'मानसिक निजता' का दायरा भी बढ़ रहा है। अब इसमें केवल बीमारी या इलाज नहीं बल्कि विचार, भावनाएं और फैसले तक शामिल हैं। खतरा यह है कि इन संकेतोंं से लोगों के व्यवहार को समझ कर उनका प्रोफाइल बनाया जा सकता है, जो कंपनियों और सरकारों के लिए निगरानी का हथियार बन सकता है।
दुनिया भी इस चुनौती को समझ रही है। 2021 में चिली ने 'मेंटल प्राइवेसी' को संवैधानिक अधिकार का दर्जा दिया। वहीं एआइ और एलन मस्क की 'न्यूरालिंक' जैसी तकनीकें विचारों को पढऩे की दिशा में बढ़ रही हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या हमारे पास इसे सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त कानून है? फिलहाल स्पष्ट नियमों की कमी दिखाई देती है। हम ऐसे मोड़ पर हैं जहां विज्ञान दिमाग का नक्शा बना रहा है और तकनीक उसे पढऩे की दिशा में बढ़ रही है। अभी यह पूरी तरह मन पढऩा नहीं है, लेकिन लोग सोचकर कर्सर हिला या शब्द चुन पा रहे हैं। यह एक ओर उम्मीद देता है, खासकर निजी सोच तक पहुंचने का खतरा भी। अगर स्पष्ट कानून नहीं बने, तो इसका दुरुपयोग हमारी निजता और आजादी को प्रभावित कर सकता है। सवाल है- क्या हम इसके लिए तैयार हैं?