तसींग का ऐतिहासिक किला हूं। मेरे किले के बुर्ज व प्राचीर खुद में करीब साढ़े चार सौ साल से पुराना स्वर्णिम इतिहास संजोए हैं। मैंने कभी हार का मुंह नहीं देखा।
मैं वो किला हूं, जिसकी तरफ देखने से भी दुश्मन घबराते थे, लेकिन अब तो मेरे अपनों ने ही मुंह फेर लिया है। शायद आप लोगों को भान नहीं है कि मैंने मैंने पठानो का शासन देखा तो उसके बाद बडग़ुजर ठाकुरों का भी शासन देखा।
मेरे स्वर्णिम अतीत में बहादूरी के कई किस्से समाए हुए हैं। मैं ताकत का जीता जागता सबूत हूं, लेकिन अब मैं अस्तित्व खोने लगा हूं। पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थित होने के कारण मैं दुश्मन सेना के दांव को पहले ही भांप लेता था। यहीं विशेषता मेरे जवानों में ऊर्जा का संचार करती थी और वे दुश्मन सेना का आसानी से परास्त कर लेते थे।
लेकिन अब तो मेरी ऊंची दीवारे जर्जर हो चुकी है तो कभी राजा-महाराजाओं से गुलजार रहने वाले बड़े हॉल व कक्ष भी अब उजाड़ हो चुके हैं। अब तो पुराने दिनों को याद करते ही मेरी आंखे छलक उठती है, लेकिन मेरे आंसू पौंछने वाला कोई नहीं।
दुश्मन सेना के लिए अभेद्य सा था ऐतिहासिक किलातसींग किले के काफी हिस्से भर-भराकर ढह चुके हैं, हालांकि इसका सामने वाला हिस्सा आज भी सुरक्षित है। इस किले को बने सैंकड़ों साल हो चुके हैं, लेकिन इसकी मजबूती देखते ही बनती है। ये किला पहाड़ी की ऊंचाई पर स्थित होने तथा अपनी बनावट के कारण अभेद्य सा रहा है।
इस किले में पालकी खाना, रथखाना व अश्व खाना बने थे। वहीं गढ़ की प्राचीर में अनगिनत मोर्चे बने हुए थे, जिनमें कभी बन्दूकें और तोप लगा कर दुश्मन सेना से लोहा लिया जाता था। गढ़ में पानी का एक टैंक बना हुआ है, जो आपातकाल में काम आता था। खडग़शाला में कभी युद्ध की सामग्री गोला बारुद, ढाल, तलवार रखे जाते थे। गढ़ की द्वितीय मंजिल पर पोथीखाना है, जिसमें कभी दुर्लभ ग्रन्थ रखे जाते थे।
इतिहास के सुनहरे पन्नों से ग्राम तसींग में पहाड़ पर स्थित ऐतिहासिक दुर्ग लगभग 460 वर्ष पुराना है। ग्रामीण आवेश दीवान बताते हैं कि गांव के बुजुर्ग सुनाते आए हैं कि यह ऐतिहासिक दुर्ग लगभग 460 वर्ष पुराना है 1580 ई. में तसींग त्रिसिंगा था, जिस पर पठानों का शासन था। बाद में बडग़ुजरों ने आधिपत्य जमा लिया था। तसींग ठिकाना अलवर रियासत के अधीन 70 घोड़ों की जागीर था।
सेठ-साहुकारों का था खूब नामतसींग प्राचीन गांव है, जिसकी पुष्टि गांव की पहाड़ी पर स्थित ऐतिहासिक किले के खंडित अवशेष भी करते हैं। गांव के सेठ-साहुकार दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे, जो उस समय के बड़े कारोबारी थे। उनकी खाली पड़ी हवेलियां आज भी उनकी शानो-शौकत की गवाह है।
इन हवेलियों के बाहर भण्डारण के लिए कक्ष बने हुए हंै, जिनमे सेठ लोग अनाज का भण्डारण करते थे। गांव के बुजुर्ग बताते है कि विक्रम संवत 1896 में देश में भीषण अकाल पड़ा था, तब गांव के सेठों ने अनाज के भण्डार गरीबों के लिए खोल दिए थे।