सरकार सोचे- गरीब क्यों रहें शिक्षा से दूर, 5.63 लाख बच्चों ने स्कूल से मुंह मोड़ा
मोहित शर्मा.
जयपुर. राजस्थान में सरकारी स्कूलों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर शिक्षा को गांव-गांव पहुंचाने की बात करती है, लेकिन हकीकत ये है कि पिछले एक साल में ही 5.63 लाख बच्चों ने सरकारी स्कूलों से मुंह मोड़ लिया। शिक्षा मंत्रालय की यूडाइस रिपोर्ट और पीएम पोषण योजना की समीक्षा में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। देशभर में नामांकन गिरावट के मामले में उत्तर प्रदेश (21.83 लाख) और बिहार (6.14 लाख) के बाद तीसरे स्थान पर राजस्थान है। ये आंकड़ा सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि राज्य के शिक्षा तंत्र पर एक बड़ा सवाल है। जहां एक ओर नेता सरकारी स्कूलों की तारीफों के पुल बांधते हैं, वहीं उनके अपने बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं। ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी, जर्जर भवन, गंदे शौचालय और डिजिटल सुविधाओं का अभाव सहित कई कारण हैं, जो सरकारी शिक्षा प्रणाली को गर्त में धकेल रहे हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में अभिभावक निजी स्कूलों को प्राथमिकता दे रहे हैं।
जयपुर: लगभग 80,000 बच्चों की कमी
(शहरीकरण और निजी स्कूलों की ओर रुझान)
उदयपुर: 30,000-40,000 बच्चों ने छोड़ा स्कूल
(आदिवासी क्षेत्रों में पहुंच और शिक्षकों की कमी)
जोधपुर: 50,000-60,000 की कमी
(ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे की कमी)
बीकानेर: 20,000-30,000 बच्चों की कमी
(मरुस्थलीय क्षेत्र, गुणवत्ता की कमी)
अलवर: 25,000-35,000 की कमी
(आर्थिक चुनौतियाँ और निजी स्कूलों की बढ़ती लोकप्रियता)
अन्य जिले (भरतपुर, सीकर, गंगानगर आदि): प्रत्येक में औसतन 10,000-20,000 बच्चों की कमी
30 जून तक मांगी रिपोर्ट
राजस्थान के सभी जिलों के लिए विशिष्ट जिलावार आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि मंत्रालय ने 30 जून 2025 तक विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। हालांकि इसका एक बड़ा कारण ये भी है कि विभाग ने डुप्लीकेट और फर्जी नामांकन को भी हटाया है, जिससे भी कमी देखी जा रही है।
निजी स्कूलों की ओर रुझान
अभिभावक निजी स्कूलों को बेहतर सुविधाओं और शिक्षा गुणवत्ता के लिए चुन रहे हैं, खासकर जयपुर जैसे शहरी क्षेत्रों में।
कोविड के बाद पलायन
महामारी के बाद ग्रामीण से शहरी क्षेत्रों में पलायन ने बच्चों को सरकारी स्कूलों से हटने के लिए मजबूर किया।
बुनियादी ढांचे की कमी
स्कूलों में शौचालय, पीने का पानी और डिजिटल सुविधाओं की कमी ने अभिभावकों का विश्वास कम किया।
शिक्षकों की कमी
राजस्थान में 15 फीसदी शिक्षक अनुपस्थित रहते हैं और रिक्त पदों ने शिक्षण गुणवत्ता को प्रभावित किया।
स्कूलों का विलय
कम नामांकन वाले स्कूलों का विलय होने से ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को स्कूल तक पहुंचने में कठिनाई।
आर्थिक कारक
ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और शहरी क्षेत्रों में आर्थिक सक्षमता ने निजी स्कूलों की मांग बढ़ाई।
डेटा सफाई
यूडाइस और नई छात्र-विशिष्ट डेटा संग्रहण पद्धति ने डुप्लिकेट/फर्जी नामांकन को हटाया, जिससे भी आंकड़े कम हुए हैं।