सीबीआइ की जांच, प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही और फोरेंसिक साक्ष्यों से स्पष्ट हुआ कि थाने के भीतर लाठियों से पिटाई के कारण 22 जून को बेनिक्स और अगले दिन उनके पिता जयराज की मौत हो गई।
लेखा रत्तनानी, वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार- तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के सतनकुलम थाने में एक व्यापारी और उनके बेटे की पुलिस हिरासत में हत्या के मामले में नौ पुलिसकर्मियों को सुनाई गई मौत की सजा जवाबदेही और न्याय के इतिहास में एक ऐतिहासिक निर्णय है। यह फैसला उस व्यवस्था पर करारा प्रहार है, जिसमें अक्सर हिरासत में लिए गए समाज के निर्धनतम और कमजोर वर्ग से आने लोगों की जान का कोई मोल नहीं समझा जाता। छह अप्रेल को मदुरै की जिला एवं सत्र अदालत के न्यायाधीश जी. मुथुकुमारन ने साल 2020 में पी. जयराज और उनके बेटे जे. बेनिक्स को हिरासत में प्रताडि़त कर जान लेने के मामले में नौ पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड का ऐतिहासिक फैसला सुनाया। न्यायाधीश मुथकुमारन ने इसे 'कानून के रखवालों की ओर से किया गया विश्वासघात' कहा। मद्रास हाईकोर्ट में अनिवार्य समीक्षा प्रक्रिया के लिए यह मामला पहुंच गया है, जिसकी सुनवाई ३० अप्रेल को होगी। मामला 19 जून 2020 का था। जब जयराज और बेनिक्स को कोविड-19 कफ्र्यू के दौरान मोबाइल एसेसरीज की दुकान खोलने पर हिरासत में लिया था। उनकी मौत पर उपजे व्यापक जन-आक्रोश के बाद राज्य सरकार ने जांच सीबीआइ को सौंप दी। सीबीआइ की जांच, प्रत्यक्षदर्शियों की गवाही और फोरेंसिक साक्ष्यों से स्पष्ट हुआ कि थाने के भीतर लाठियों से पिटाई के कारण 22 जून को बेनिक्स और अगले दिन उनके पिता जयराज की मौत हो गई। अभियोजन पक्ष ने इसे 'समाज की सामूहिक चेतना को झकझोरने वाला जघन्य अपराध' बताया।
जयराज और बेनिक्स आम नागरिक थे, जो महामारी में प्रतिबंधों के कठिन दौर के बीच अपनी आजीविका चला रहे थे। उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड भी नहीं था। शायद इसीलिए उनकी मौत पर व्यापक आक्रोश उपजा, जिसने सरकार को सीबीआइ जांच करवाने के लिए मजबूर किया। 2018 में केरल की अदालत ने दो पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई थी, पर 2024 में केरल उच्च न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया था। एक साथ नौ पुलिसकर्मियों को मौत की सजा उस व्यवस्था को झकझोर सकती है, जिसने अब तक सुधारों का विरोध किया है। यह फैसला देशभर के कानून के रखवालों को स्पष्ट चेतावनी है कि कानून से ऊपर कोई नहीं और अपनी सीमाएं लांघने की उन्हें भी भारी कीमत चुकानी होगी। समाज को अब हिरासत में मौतों, फर्जी मुठभेड़ों और गैर-न्यायिक हत्याओं को ठंडे दिमाग से की गई हत्या के रूप में देखना होगा। इनके प्रति राष्ट्र की नीति शून्य सहिष्णुता की होनी चाहिए। ऐसे वर्दीधारी अपराधी दरअसल 'सीरियल किलर' की तरह हैं, जो शपथ और संवैधानिक प्रक्रिया का गला घोंटने का काम करते है। हिरासत में प्रताडऩा को रोकने के लिए भारत को और भी कड़े कदम उठाने होंगे। हिरासत में यातना ही इन मौतों का कारण है- यह पुलिसिंग के उस दृष्टिकोण का परिणाम है, जिसे समाप्त होना चाहिए। उपाय यह है कि जिला पुलिस प्रमुखों को उनके क्षेत्राधिकार में होने वाली हिरासत में मौत के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाए। इससे सजा की गाज केवल कनिष्ठ कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहेगी, नेतृत्व की जवाबदेही भी सुनिश्चित होगी।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आंकड़े डराने वाले हैं। 2021-22 में हिरासत में 2,307 मौतें दर्ज की गईं। वहीं फर्जी मुठभेड़ें भी बढ़ी है। 2022-2026 के बीच मानवाधिकार आयोग ने पुलिस हिरासत में मौत के 786 मामले दर्ज किए हैं। 1997 में मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एम.एन. वेंकटचलैया ने कहा था कि कानून पुलिस को किसी की जान लेने का अधिकार नहीं देता है और यदि कोई पुलिसकर्मी ऐसा करता है, तो वह 'आपराधिक मानव वध' का दोषी है। विडंबना यह है कि आज हमारे समाज का एक हिस्सा एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अधिकारियों को नायक की तरह देखता है। ये अधिकारी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं और सार्वजनिक कार्यक्रमों में सम्मानित होते हैं। हमें यह समझने की जरूरत है कि मुठभेड़ों से कानून-व्यवस्था नहीं सुधरती। इससे पुलिस के भीतर ही ऐसे गिरोह पनपते हैं, जो गैंगस्टरों के इशारे पर काम करने लगते हैं और पुलिसिंग को वसूली का जरिया बना लेते हैं। अदालत का संदेश स्पष्ट और सशक्त है- न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन अपराध को कम नहीं करता, बल्कि नए अपराधियों को जन्म देता है, जो वर्दी के पीछे छिपकर कमजोर लोगों पर अत्याचार करते हैं। यदि भारत को मजबूत अर्थव्यवस्था और सम्मानित लोकतंत्र बनना है, तो इस प्रवृत्ति को हर हाल में समाप्त करना होगा।