13 मई 2008 को हुए जयपुर बम धमाकों की दर्दनाक यादें आज भी कई परिवारों के जीवन में गहरी छाप छोड़ती हैं। इस हमले में गंभीर रूप से घायल सुशीला साहू वर्षों तक कोमा में रहीं, जिनकी कहानी आज भी उस त्रासदी की भयावहता को सामने लाती है।
Human Angle Story Of Jaipur Bomb Blast: जयपुर में सिलसिलेवार 8 बम धमाकों की 13 मई 2008 की वह रात शायद ही कोई भूला होगा। इस मामले में दिसंबर 2019 में जयपुर की बम विस्फोट मामलों की विशेष अदालत ने फांसी की सजा सुनाई, जिसे हाईकोर्ट ने 2023 में रद्द कर दिया। इसे पहले बम धमाके में जान गंवाने वालों के परिजनों व बाद में राज्य सरकार ने अपील के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने चारों आरोपियों को सशर्त जमानत दी।
इसी बीच घटना के समय एक जिंदा बम मिलने के मामले में विशेष अदालत ने चार आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जिसे आरोपियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी है। हाईकोर्ट से आरोपियों को अभी कोई राहत नहीं मिली है।
जयपुर सास सुशीला साहू सिर्फ हमारे घर की मुखिया नहीं थीं, बल्कि पूरे परिवार की आत्मा थीं। घर में बुजुर्गों का सम्मान कैसे करना है, रिश्तों को कैसे जोड़े रखना है और हर परिस्थिति में परिवार को कैसे संभालना है, यह मैंने उन्हीं से सीखा। लेकिन 13 मई 2008 को जयपुर के परकोटे में हुए बम धमाकों ने हमारी जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी।
मैंने 12वीं की परीक्षा देकर नए सपनों के साथ ससुराल में कदम रखा था। तभी चांदपोल स्थित हनुमान मंदिर में हुए धमाकों ने हमारी दुनिया उजाड़ दी। मम्मीजी मंदिर में दर्शन कर रही थीं, तभी एक के बाद एक धमाके हुए और उनके सिर में छह छरें घुस गए।
आज 18 साल बाद भी उनका चेहरा आंखों के सामने वैसे ही है। उनकी आंखें खुली रहती थीं, लेकिन वे कितना देख पाती थीं, कितना सुन पाती थीं, यह कोई नहीं जानता। फिर भी हमेशा लगता था कि उन्हें घर की हर आवाज सुनाई देती है। बच्चों की किलकारियां, परिवार की बातें और हमारे संघर्ष… शायद सब महसूस होता होगा।
मम्मीजी की बीमारी ने सिर्फ एक इंसान नहीं, पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी। उन्होंने हमें टूटने नहीं दिया। उनके बिस्तर के आस-पास ही हमारा परिवार और मजबूत होता गया। पापा राजेन्द्रजी साहू ने घर को अस्पताल बना दिया। मशीनें, दवाइयां और हर जरूरी सुविधा जुटाई गई। समय के साथ घर में शादियां हुई, बच्चे बड़े हुए, लेकिन मम्मीजी उसी बिस्तर पर रहीं।
मैं और परिवार के चारों बच्चे, जितेश, प्रिया, नेहा, पीयूष अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को निभाते हुए एकता के सूत्र में बंधे रहे। छोटे बेटे पीयूष ने डॉक्टर बनने का सपना पूरा किया और आज अजमेर के जेएलएन अस्पताल में न्यूरोसर्जन हैं। आज जब धमाकों की 18वीं बरसी है, तब महसूस होता है कि आतंक मात्र शरीर को ही घायल नहीं करता, वह पूरे परिवार की जिंदगी बदल देता है। मेरा मानना है कि पिता की पगड़ी बेटे के सिर तो सास की किसे पहनानी चाहिए।
(पत्रिका रिपोर्टर विकास जैन से उन्होंने अपना दर्द साझा किया)
SMS मेडिकल कॉलेज का दृश्य आज भी आंखों में ताजा है। हर तरफ घायल लोग, चीख, पुकार और लाशें थीं। हमने साड़ी के रंग से मम्मीजी को पहचाना। उस समय उनकी सांसें चल रही थीं। लगा सब ठीक हो जाएगा। कुछ देर बाद उन्हें होश भी आया, लेकिन देर रात हालत बिगड़ गई।
डॉक्टरों ने बताया कि सिर में घुसे लोहे के छर्रे पूरे मस्तिष्क में फैल गए हैं। तीन ऑपरेशन हुए, मगर उसके बाद मम्मीजी कोमा में चली गई। जिसने पूरे परिवार को अपने प्यार और अनुशासन से संभाला था, वही बिस्तर तक सीमित हो गई और 29 अप्रेल 2013 को उनकी मौत हो गई।'
लेखिका अनुपमा बम धमाकों के बाद 5 साल से अधिक समय तक कोमा में रही सुशीला साहू की पुत्रवधु हैं।