
अगर आप राजस्थान की राजधानी जयपुर में अपना खुद का मकान, फ्लैट या जमीन खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो ये खबर अच्छे से पढ़ लें। दरअसल, जयपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में डीएलसी दरों (DLC Rates) को लगभग 40 प्रतिशत तक बढ़ाने का एक नया प्रस्ताव तैयार किया गया है, जिसके विरोध में रियल एस्टेट डेवलपर्स की सबसे बड़ी संस्था क्रेडाई, राजस्थान (Credai Rajasthan) ने पूरी तरह से मोर्चा खोल दिया है। क्रेडाई के पदाधिकारियों का साफ कहना है कि यदि प्रशासन द्वारा बिना किसी ठोस जमीनी मूल्यांकन के इस प्रस्तावित बढ़ोतरी को लागू किया जाता है, तो यह मध्यमवर्गीय परिवारों के आशियाने के सपने पर एक बहुत बड़ा वित्तीय आघात होगा।
रियल एस्टेट सेक्टर के दिग्गजों ने इस बात पर गहरी आपत्ति जताई कि सरकार बिना स्थानीय जनप्रतिनिधियों और बाजार विशेषज्ञों की राय लिए इतना बड़ा फैसला करने जा रही है। इस निर्णय से न केवल जमीनें महंगी होंगी, बल्कि इसका सीधा नकारात्मक असर कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री, रोजगार के अवसरों और अंततः राज्य सरकार के अपने राजस्व पर भी देखने को मिलेगा, जिससे पूरे बाजार में एक बार फिर मंदी की स्थिति पैदा हो सकती है।
क्रेडाई राजस्थान के पदाधिकारियों ने सरकार के इस कदम पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि किसी भी क्षेत्र की डीएलसी दरों में बदलाव करने से पहले वहां के वास्तविक बाजार मूल्य का एक विस्तृत और वैज्ञानिक सर्वे कराया जाना कानूनी और व्यावहारिक रूप से अनिवार्य होना चाहिए। लेकिन वर्तमान प्रस्ताव को तैयार करते समय नियमों की अनदेखी की गई है।
संस्था ने मांग की है कि जब तक राजधानी के सभी प्रमुख और नए विकसित हो रहे क्षेत्रों का निष्पक्ष सर्वे पूरा नहीं हो जाता और स्थानीय विधायकों या जनप्रतिनिधियों से लिखित राय नहीं ले ली जाती, तब तक इस 40 प्रतिशत की प्रस्तावित वृद्धि को पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया जाना चाहिए।
रियल एस्टेट उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि जयपुर में प्रॉपर्टी सेक्टर पर पिछले कुछ सालों से लगातार टैक्स और शुल्क बढ़ाए जा रहे हैं। क्रेडाई के चेयरमैन अनुराग शर्मा ने बताया कि वर्ष 2024 से लेकर अब तक जयपुर में डीएलसी दरों में लगातार कई बार बढ़ोतरी की जा चुकी है। सबसे पहले एक मुश्त 10 प्रतिशत की सामान्य वृद्धि लागू की गई थी। उसके ठीक बाद एक नया नियम लाकर सड़कों की चौड़ाई के आधार पर अलग से 10, 15 और 20 प्रतिशत तक की अतिरिक्त बढ़ोतरी थोप दी गई।
सरकारी रिकॉर्ड में निर्माण दरों में भी पहले ही 50 प्रतिशत तक की भारी वृद्धि की जा चुकी है, जिसका सीधा और पूरा असर स्टांप ड्यूटी के रूप में आम खरीदार की जेब पर पड़ रहा है।
मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए क्रेडाई के अध्यक्ष रविन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि किसी भी संपत्ति की रजिस्ट्री के दौरान लगने वाले अधिकांश कर और सरकारी शुल्क पूरी तरह से डीएलसी दरों को ही अपना आधार मानते हैं। जब आधार मूल्य में ही 40 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि कर दी जाएगी, तो रजिस्ट्री चार्ज और अन्य टैक्स स्वतः ही बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे।
क्रेडाई अध्यक्ष ने कहा कि बिना किसी ठोस आर्थिक विश्लेषण और बाजार की क्रय शक्ति को समझे इतनी बड़ी बढ़ोतरी को किसी भी स्थिति में न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता। इससे मिडिल क्लास परिवार जो होम लोन लेकर घर खरीदने की कोशिश करते हैं, उनका पूरा बजट बिगड़ जाएगा।
संस्था के महासचिव आशीष अग्रवाल ने पुरानी व्यवस्था की याद दिलाते हुए प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि पूर्व में जब भी जिला प्रशासन द्वारा डीएलसी दरों का निर्धारण या पुनरीक्षण किया जाता था, तो बकायदा क्रेडाई के प्रतिनिधियों, रियल एस्टेट विशेषज्ञों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को कमेटियों में शामिल कर उनके व्यावहारिक सुझाव लिए जाते थे। लेकिन इस बार इस पूरी पारदर्शी प्रक्रिया को दरकिनार कर बंद कमरों में प्रस्ताव तैयार कर लिया गया है, जो कि पूरी तरह से अनुचित है।
रियल एस्टेट उद्योग के कार्यकारी अध्यक्ष अनिल गुप्ता, वाइस चेयरमैन राजेन्द्र सिंह पचार, कोषाध्यक्ष गिरिराज अग्रवाल और प्रवक्ता मदन यादव ने संयुक्त बयान में कहा कि वर्तमान में सीमेंट, सरिया, लेबर और अन्य निर्माण सामग्री की बढ़ती लागत के कारण बिल्डर्स और डेवलपर्स पहले से ही बहुत कम मार्जिन पर काम कर रहे हैं। यदि यह नया प्रस्ताव लागू हुआ तो रियल एस्टेट सेक्टर पूरी तरह से ठप हो जाएगा, जिससे इस सेक्टर से जुड़े लाखों निर्माण श्रमिकों और मजदूरों के सामने रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा।
हालांकि, क्रेडाई पदाधिकारियों ने उम्मीद जताई है कि राज्य के मुखिया जनहित को सर्वोपरि रखते हैं, इसलिए इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए क्रेडाई का एक उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल बहुत जल्द मुख्यमंत्री से मिलकर उन्हें इस पूरी जमीनी हकीकत से अवगत कराएगा।