जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में आयोजित सत्र में शिक्षा, कहानी कहने और रचनात्मकता पर चर्चा। विशेषज्ञों ने बच्चों में कला व पढ़ने की आदत के महत्व पर जोर दिया।
जयपुर। लिटरेचर फेस्टिवल के दरबार हॉल में शनिवार को राजस्थान पत्रिका की ओर से आयोजित सत्र ‘लर्निंग टू रीड, रीडिंग टू लर्न’ में शिक्षा के बदलते स्वरूप और कहानी कहने की भूमिका पर गहन चर्चा हुई। सत्र का संचालन द कुलिश स्कूल के प्रिंसिपल देबाशीष चक्रवर्ती ने किया। सत्र में रचनात्मक क्षेत्र से जुड़े कलाकार चार्मी छेड़ा, लेखिका हेमांगिनी दत्त मजूमदार और लेखक व स्केच आर्टिस्ट निशांत जैन ने अपने विचार साझा किए।
सत्र की शुरुआत में देबाशीष चक्रवर्ती ने राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश के जीवन और विचारों को याद किया। उन्होंने कहा कि कुलिश का जीवन शब्दों से नहीं, बल्कि मिट्टी, संघर्ष और अनुशासन से गढ़ा गया था। उनके अनुसार शिक्षा और पत्रकारिता दोनों ही विश्वास का कार्य हैं, जहां ज्ञान केवल उपलब्धि नहीं बल्कि जिम्मेदारी है। बच्चों को केवल बोलना नहीं, सुनना भी सीखना चाहिए और केवल आगे बढ़ना नहीं, बल्कि मूल्यों के साथ टिके रहना भी सीखना चाहिए। सत्र में यह भी चर्चा हुई कि कहानियां बच्चों को जटिल नैतिक परिस्थितियों को समझने में मदद करती हैं। वक्ताओं ने कहा कि बच्चे स्वयं एक कहानी हैं और उन्हें यह समझना जरूरी है कि वे अपनी कहानी को बदल भी सकते हैं। जब बच्चों को कल्पना पर भरोसा करना सिखाया जाता है, तो यह उनके जीवन को सकारात्मक दिशा देता है।
निशांत जैन ने कहा कि आज का समाज परिणामों को लेकर जरूरत से ज्यादा दबाव बनाता है। इसी कारण बच्चे ड्राइंग, लेखन और कला से दूर हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि कला का उद्देश्य अच्छा परिणाम नहीं, बल्कि प्रक्रिया का आनंद है। स्केचबुक रखने की आदत को उन्होंने आत्म-अभिव्यक्ति, सजगता और स्वतंत्र सोच का माध्यम बताया।
चर्चा के दौरान चार्मी छेड़ा ने अपने रचनात्मक सफर के बारे में बताते हुए कहा कि बचपन में वे अंतर्मुखी थीं और किताबों में ही अपनी दुनिया खोजती थीं। स्कूल की लाइब्रेरी उनके लिए सबसे सुरक्षित स्थान थी। किताबों से उनका रिश्ता बहुत जल्दी बन गया। बाद में थिएटर से जुड़ाव ने उन्हें कहानी को जीना और वर्तमान में रहना सिखाया। उन्होंने कहा कि कहानी कहना उनके लिए स्वाभाविक प्रक्रिया है और वही उनकी पहचान बन गई।
हेमांगिनी दत्त मजूमदार ने अपनी रचनात्मक यात्रा साझा करते हुए कहा कि शब्दों के साथ खेलना, अलग-अलग दृष्टिकोण से एक ही वाक्य को देखना और धीरे-धीरे कहानी को गढ़ना उन्हें आकर्षित करता है। उन्होंने कहा कि रहस्य कथाएं केवल अंत जानने के लिए नहीं होतीं, बल्कि उनके बीच का संसार, वातावरण और संवेदनाएं भी उतनी ही जरूरी होती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन की तरह साहित्य भी जटिल और बहुस्तरीय होता है।