इक्कीसवीं सदी भी एक-चौथाई बीत चुकी है। लेकिन, जाति-वर्ण-धर्म के आधार पर झगड़े आज भी हो रहे हैं। इंसान आखिर इस पचड़े से क्यों नहीं निकल पा रहा है? राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक कर्पूर चन्द्र कुलिश ने इस सवाल का बड़ा आसान जवाब दिया था।
हम धीरे-धीरे 22वीं सदी की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन, जाति-वर्ण-धर्म के आधार पर झगड़े समाज का पीछा नहीं छोड़ रहे। समाज को इस आधार पर आज भी बांटा जा रहा है। एआई को जन-जन तक पहुंचाने वाला इंसान आखिर इस पचड़े से क्यों नहीं निकल पा रहा है? आखिर क्यों? यह सवाल हर संवेदनशील व्यक्ति को परेशान करता रहा है। अरसे से। राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक कर्पूर चन्द्र कुलिश ने इस सवाल का बड़ा आसान जवाब दिया था।
कुलिश जी ने लिखा- हम सब शूद्र हैं। मति भ्रम के कारण वर्ण-व्यवस्था और जाति प्रथा को एक ही समझा जा रहा है। उन्होंने वर्ण-व्यवस्था को लेकर देश में छिड़े विवाद का मुख्य कारण इसे ही बताया था और कहा था कि देश के नेता, समाजशास्त्री और तथाकथित धर्म-गुरु अपने-अपने स्वार्थों के कारण जनता को गुमराह कर रहे हैं।
उन्होंने बताया कि इस संदर्भ में दो मुख्य बातें समझने वाली हैं। पहली यह कि वैदिक ऋषियों ने जिस वर्ण-व्यवस्था का विधान किया, वह पूरी तरह लुप्त हो चुकी है। उस वर्ण व्यवस्था के आधार पर कोई अपने को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र मानता है तो वह पाखंड है।
इसे उन्होंने इस तरह समझाया, ‘वैदिक ऋषियों ने मानव के व्यक्तिगत विकास के लिए आश्रम व्यवस्था और सामाजिक जीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए वर्ण-व्यवस्था की रचना नैसर्गिक वर्णों के आधार पर की थी। विश्व में तीन मूल तत्व हैं- ज्ञान, क्रिया और अर्थ। शास्त्रों में ज्ञान को ब्रह्म का रूप माना है। ब्रह्म तत्व की प्रधानता के कारण ब्रह्म से ओत-प्रोत मानव को ब्राह्मण माना गया है। क्रिया तत्व की प्रधानता वाले मानव को क्षत्रिय कहा गया और वित्त या अर्थ प्रधान जीवन को वैश्य कहा गया।’ यह व्यवस्था पूरी तरह गुण और कर्म के आधार पर की गई (चातुर्वण्यं मया सृष्टं गुण-कर्म-विभागश:)। इसमें ऊंच-नीच या छूआछूत का कोई स्थान नहीं है।’
इसके अतिरिक्त यह भी कहा गया है कि शूद्र कोई वर्ग विशेष नहीं है, बल्कि जन्म से हम सभी शूद्र हैं। ‘जन्मना जायते शूद्र: संस्काराद् द्विज उच्यते।’ शास्त्रों ने द्विज या द्विजाति का स्वरूप बताया है, जो जन्म के उपरांत संस्कार के बाद ही बनता है। द्विज या द्विजाति के जो मापदंड शास्त्रों में रखे गए हैं, उनके अनुसार आज देश में कोई द्विजाति नहीं है।
दूसरी प्रमुख बात जो समझने की है, वह जाति प्रथा के बारे में है। जाति प्रथा वास्तव में अर्थव्यवस्था का ही यथार्थ रूप है। जातियां मूलतः कर्म के साथ जुड़ी हुई हैं। खाती, मोची, लुहार, धोबी, चौधरी, पटेल, पटवारी, कानूनगो, पुजारी, कोठारी, भण्डारी आदि।
कुछेक जातियां किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति के वर्चस्व के कारण बन गईं। जैसे ऋषियों के नाम पर वशिष्ठ, भारद्वाज, कौशिक आदि बन गए।
कितनी ही जातियां स्थान के साथ जुड़ गईं। जैसे फतेहपुरिया, मलीहाबादी, बगड़का, सिंघानियां, जैसलमेरिया आदि, आदि। फिर भी जाति प्रथा का मूल स्वरूप आर्थिक है।
2500 वर्षों से ज्यादा के इतिहास में सभी नायक और विजेता जाति प्रथा के विरोधी रहे हैं। फिर भी कोई जाति प्रथा का बाल बांका नहीं कर पाया, क्योंकि वह अर्थव्यवस्था के ठोस आधार पर खड़ी है। देश के नेताओं ने अर्थव्यवस्था को आधार मान कर इसी व्यवस्था को आधुनिक तकनीक और बाजार व्यवस्था के सहारे विकसित करने के बजाय विदेशी अर्थशास्त्र के बल पर विकास योजनाएं बनाईं और उधार के आधार पर साथी कार्यक्रम चलाए।
हमने कभी जाति प्रथा की शक्ति को समझा ही नहीं। उसे एक रूढ़ि समझ कर दुत्कारते रहे या आरक्षण के माध्यम से उसे एक वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहे। हमने कभी नहीं सोचा कि आधुनिक सफाई व्यवस्था का प्रयोग करके नई आवास नीति बनाते और मैला उठाने की प्रथा बंद कर देते।
आज जो जातिवाद का भूत डरावना लगने लगा है, वह इसी विचारहीन राजनीति का परिणाम है।
(राजस्थान पत्रिका के संस्थापक संपादक कर्पूर चन्द्र कुलिश के करीब 30 साल पुराने आलेख के अंश। मूल आलेख का शीर्षक था ‘कोई ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य नहीं, हम सब शूद्र हैं’, आलेख उनकी जन्मशती पर प्रकाशित किए जाने वाले उनके विचारों की शृंखला के तहत पेश किया गया है।)