जयपुर

कुलपति चयन में जवाबदेही तथा पारदर्शिता जरूरी

निरंतर विवादों और अदालती कार्यवाहियों से संस्थानों की वैश्विक और राष्ट्रीय रैंकिंग गिरती है। एक अयोग्य कुलपति अक्सर अपने चारों ओर ऐसे ही लोगों का घेरा बनाता है।

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May 01, 2026

प्रो. अशोक कुमार पूर्व कुलपति,गोरखपुर विश्वविद्यालय- किभी राष्ट्र की प्रगति उसके उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है, जिसका सीधा संबंध कुलपति के नेतृत्व से होता है। कुलपति केवल एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि एक अकादमिक ध्वजवाहक और शिक्षक-छात्रों-प्रशासक के बीच का सेतु है। वर्तमान में, विशेषकर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, ओडिशा और दक्षिण भारत के राज्यों में कुलपतियों की शीघ्र नियुक्ति प्रक्रिया होने वाली है, जिनकी कार्यशैली गंभीर विवादों के घेरे में है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक 'शिक्षा प्रदूषण' है, जो आने वाली पीढिय़ों के भविष्य को प्रभावित कर रहा है।

यूजीसी नियमावली 2018 के अनुसार, एक कुलपति के लिए उत्कृष्ट अकादमिक रेकॉर्ड, न्यूनतम दस वर्ष का प्रोफेसर के रूप में अनुभव और बेदाग चरित्र अनिवार्य अर्हताएं हैं। दुर्भाग्यवश, अभी भी उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे कुछ राज्य ऐसे हैं, जो कुलपति की नियुक्ति के लिए यूजीसी के नियमों का पालन नहीं करते हैं। आदर्श रूप में, कुलपति वह सेतु है, जो शिक्षकों, छात्रों और प्रशासन के बीच तालमेल बिठाता है, शोध के लिए अनुकूल वातावरण सृजित करता है और संस्थान को दूरदर्शी नीतियां प्रदान करता है। परंतु, वास्तविकता में कुलपतियों के स्वरूप में एक गहरा विभाजन दिखाई देता है। जहां एक ओर 'प्रशासकीय', 'शैक्षणिक' और 'सामाजिक' कुलपति संस्थान के अनुशासन और सामुदायिक जुड़ाव को बढ़ाते हैं, वहीं दूसरी ओर 'राजनीतिक' और 'भ्रष्ट' कुलपतियों का उदय वर्तमान समय की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। धनबल या राजनीतिक रसूख से पद हथियाने वाले व्यक्ति शैक्षणिक हितों की बलि देकर व्यक्तिगत लाभ और पक्षपात को बढ़ावा देते हैं, जिससे संस्थान की स्वायत्तता का धीरे-धीरे क्षरण होने लगता है।

कुलपति चयन की वर्तमान 'सर्च-कम-सलेक्शन कमेटी' की कार्यप्रणाली पर अक्सर प्रश्नचिह्न लगते रहे हैं। कई मामलों में ये समितियां केवल 'रबर स्टैंप' की तरह कार्य करती हैं, जिनका उद्देश्य योग्यता के बजाय सत्ता के गलियारों में पसंद किए गए चेहरों को वैधता प्रदान करना होता है। हालिया वर्षों में, विशेषकर तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में, कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकारों और राज्यपालों (कुलाधिपति) के बीच शक्तियों का संघर्ष चरम पर पहुंचा है। 8 अप्रेल 2025 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तमिलनाडु के संदर्भ में दिया गया निर्णय एक मील का पत्थर है, जिसमें स्पष्ट किया गया कि कुलपति की नियुक्ति में यूजीसी के मानदंडों का उल्लंघन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। यह खेदजनक है कि कई बार कानूनी प्रक्रियाओं की पेचीदगी के कारण अयोग्य व्यक्ति पद पर बने रहते हैं और जब तक न्यायालय का निर्णय आता है, तब तक वे अपना कार्यकाल पूरा कर चुके होते हैं। यह स्थिति न केवल योग्य शिक्षाविदों का मनोबल गिराती है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता पर भी चोट करती है।

विश्वविद्यालय नेतृत्व के संकट का एक और काला पक्ष 'अतिरिक्त प्रभार' या 'तदर्थ' नियुक्तियां हैं। राज्यों में, जहां कई विश्वविद्यालयों में स्थायी कुलपतियों का अभाव है, यह व्यवस्था एक स्थायी समस्या बन गई है। तदर्थ कुलपति के पास न तो दीर्घकालिक विजन होता है और न ही बड़े नीतिगत निर्णय लेने की शक्ति। वे केवल दैनिक कार्यों के संपादन तक सीमित रहते हैं। जब नेतृत्व अस्थायी होता है, तो पूरे विश्वविद्यालय का नैतिक मनोबल गिर जाता है। संकाय सदस्य भविष्य की योजनाओं के प्रति उदासीन हो जाते हैं और जवाबदेही का अभाव संस्थान को अराजकता की ओर धकेलता है। समय पर नियुक्ति न कर पाना स्पष्ट रूप से प्रशासनिक अदूरदर्शिता का प्रतीक है। नेतृत्व का यह संकट केवल फाइलों तक सीमित नहीं है, इसके सामाजिक परिणाम अत्यंत व्यापक और हानिकारक हैं। निरंतर विवादों और अदालती कार्यवाहियों से संस्थानों की वैश्विक और राष्ट्रीय रैंकिंग गिरती है। एक अयोग्य कुलपति अक्सर अपने चारों ओर ऐसे ही लोगों का घेरा बनाता है। इससे शोध में 'साहित्यिक चोरी' को बढ़ावा मिलता है और अकादमिक योग्यता के बजाय 'जी-हुजूरी' पदोन्नति का आधार बन जाती है। राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण विश्वविद्यालय स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता खो देते हैं, जिससे वे केवल सरकारी विभागों की कार्बन कॉपी बनकर रह जाते हैं। इस 'शिक्षा प्रदूषण' को रोकने और विश्वविद्यालयों को पुन: बौद्धिक केंद्र बनाने के लिए कुछ क्रांतिकारी बदलावों की आवश्यकता है।

आवश्यक है कि कुलपति चयन प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध हो। चयन प्रक्रिया कार्यकाल समाप्त होने से पहले शुरू हो और नए कुलपति का कार्यभार तुरंत संभालना सुनिश्चित किया जाए। चयनित उम्मीदवारों के शैक्षणिक दस्तावेज सार्वजनिक हों और 'ओपन हियरिंग' के माध्यम से उनकी दृष्टि स्पष्ट हो। यदि चयन में अनियमितता पाई जाए, तो संबंधित समिति पर कार्रवाई हो। नियुक्ति का आधार केवल अकादमिक योग्यता हो। अब समय आ गया है कि 'एड-हॉकÓ संस्कृति को समाप्त कर योग्यता-आधारित स्थायी नियुक्तियों को प्राथमिकता दी जाए। 'वैचारिक प्रतिबद्धता' के बजाय 'अकादमिक प्रतिबद्धता' होनी चाहिए। पूरे देश में आगामी समय में होने वाली नियुक्तियां यह तय करेंगी कि क्या हम अपनी शिक्षा प्रणाली को इस दलदल से बाहर निकालना चाहते हैं या नहीं। हमें योग्यता-आधारित स्थायी नियुक्तियों की ओर बढऩा होगा। तभी हमारे विश्वविद्यालय वैश्विक रैंकिंग में अपना स्थान बना पाएंगे और आने वाली पीढिय़ों को स्वस्थ शैक्षिक वातावरण प्रदान कर सकेंगे।

Published on:
01 May 2026 03:27 pm
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