
डॉ. संजय शर्मा - भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक दत्तोपंत ठेंगड़ी के द्वारा किया गया उद्घोष मजदूरों, दुनिया को एक करो, महज एक नारा नहीं था बल्कि विश्व निर्माण की आयोजना में श्रम और श्रमिकों के ऐतिहासिक अवदान को एक नए आर्थिक-राजनीतिक अर्थ-संदर्भ में देखने का एक भारतीय नजरिया था। वैश्विक अर्थव्यवस्था में जहाँ मार्क्सवाद के प्रभाव से दुनिया के मजदूरों, एक हो जाओ के नारे के माध्यम से श्रमिकों को वर्ग-संघर्ष के लिए लामबंद किया जा रहा था, वहीं भारतीय मजदूर संघ ने श्रम की अस्मिता को केंद्र में रखकर दुनिया को सँवारने का एक मानवीय, रचनात्मक और समरसता-पूर्ण विकल्प प्रस्तुत किया।कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स के कम्युनिस्ट घोषणापत्र (1848) में उद्धृत दुनिया के मजदूरों, एक हो जाओ, तुम्हारे पास खोने के लिए अपनी जंजीरों के सिवा कुछ नहीं, और जीतने के लिए पूरा संसार है। नि:संदेह, श्रम और श्रमिकों के ऐतिहासिक शोषण और वंचना से उपजे आक्रोश को समेटे यह नारा, कामगारों के विभाजन और विभाजन के कारणों से हुई उनके श्रम की लूट और अस्मिता-हनन का ऐतिहासिक दस्तावेज है। जिसकी मूल प्रेरणा वर्ग-संघर्ष पर आधारित है, जो मजदूर वर्ग को पूंजीवाद एवं सामन्तवाद के ख़िलाफ़ एकजुट होकर लड़ने की अपील करता है।किन्तु ऐसा मान लेना एक ज्ञानमीमांसीय भूल ही होगी कि केवल श्रमिक स्वयं संगठित होकर ही आधुनिक अर्थ-तंत्र में पूंजीवाद के वर्चस्व से मुकाबला कर सकता है?
इसके विपरीत, भारतीय सांस्कृतिक चेतना श्रम और श्रमिकों को आधुनिक पूँजीवाद की संकीर्ण दृष्टि से परे देखती है। मजदूरों, दुनिया को एक करो, यह वैचारिक परिवर्तन की एक कार्यात्मक परियोजना है, जो दुनिया को श्रमिक-केन्द्रित बनाती है। जहाँ मजदूरों से यह आव्हान किया गया है कि वे अपने श्रम के बल पर सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक आयामों में विभाजित एवं विषमतापूर्ण दुनिया को एक करें।वस्तुत: यह एक भावात्मक संकल्प है, जो सामाजिक सद्भाव और आर्थिक उद्यमिता के बीच समरसता की अवधारणा से जुड़ा है। श्रम से ही दुनिया एकजुट और समृद्ध होती है, न कि सिर्फ वर्ग-संघर्ष से। मजदूरों के द्वारा दुनिया को एकजुट किये जाना केवल मजदूरों के व्यक्तिगत हितों के संरक्षण का आव्हान नहीं, बल्कि यह समूची मानव संस्कृति की चेतना के नव-निर्माण का पाथेय है। ठेंगड़ी जी कहते थे कि दुनिया के मजदूरों एक हों की बजाय मजदूरों दुनिया को एक करो, यह दो शब्दों का उलट-फेर ही वैचारिक बदलाव लाता है।
यह वैचारिक बदलाव ही श्रमिक को दुनिया के निर्माण में निष्क्रिय अभिकर्ता नहीं, बल्कि सक्रिय, प्रबुद्ध और रचनात्मक भागीदार बनाता है। वस्तुत: श्रम मानव जीवन का मूल तत्व है, यह केवल आर्थिक उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, आत्म-सम्मान और सामाजिक समरसता का आधार भी है।श्रम के आधार पर विभाजन मानव इतिहास की सबसे बड़ी सभ्यतागत भूल है। पाश्चात्य परंपरा भी श्रम को मनुष्य की प्रजातिगत विशेषता मानती है, जिसके माध्यम से मनुष्य प्रकृति को रूपांतरित करता है और स्वयं को विकसित करता है। पूंजीवादी व्यवस्था में श्रमिक अलगाव की प्रकृति से गुजरते हुए अपने श्रम के उत्पाद, प्रक्रिया और अन्य श्रमिकों से अलग हो जाता है।
भारतीय दृष्टि श्रम की गरिमा को सर्वोच्च स्थान देती है। महात्मा गाँधी मानते थे कि हर व्यक्ति को अपनी रोटी के लिए शारीरिक श्रम करना चाहिए। शारीरिक श्रम से चरित्र का निर्माण होता है, आलस्य दूर होता है और समाज में समानता आती है। उन्होंने अहिंसा और सत्य के साथ श्रम को जोड़ा और बताया कि श्रम पूंजी पर नहीं, बल्कि पूंजी श्रम पर निर्भर होनी चाहिए। उन्होंने ग्राम स्वराज और कुटीर उद्योगों के माध्यम से श्रम-केंद्रित अर्थव्यवस्था की कल्पना की । डॉ. अम्बेडकर ने श्रम को सामाजिक न्याय और गरिमा से जोड़ते हुए बताया कि श्रम केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और सशक्तिकरण का माध्यम है। बाबा साहेब जाति व्यवस्था को श्रम नहीं बल्कि श्रमिकों का विभाजन मानते थे। उन्होंने श्रमिकों के लिए उचित वेतन, आठ घंटे का कार्यदिवस, मातृत्व लाभ, सामाजिक सुरक्षा और हड़ताल का अधिकार जैसे सुधारों की पैरवी की। उनके अनुसार, श्रमिकों की गरिमा तभी संभव है जब आर्थिक समानता से पहले सामाजिक समानता स्थापित हो। डॉ. अम्बेडकर ने श्रम को केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि वंचित वर्ग की ऐतिहासिक उत्पीड़न एवं गुलामी से मुक्ति का साधन माना ।
Published on:
01 May 2026 03:33 pm
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