जयपुर की 'राजमाता' महारानी गायत्री देवी की जयंती आज, आलीशान महलों और गिनीज बुक रिकॉर्ड से लेकर तिहाड़ जेल की वो दास्तान जिसने भारतीय सियासत को हिला दिया। जानें मरुधरा की सबसे ग्लैमरस नेता का अनसुना राजनीतिक सफर।
राजस्थान का इतिहास केवल किलों, महलों और राजा-महाराजाओं की कहानियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कहानी है उस लोकतान्त्रिक चेतना की जिसे राजशाही के वैभव से निकलकर सीधे जनता के दिलों तक पहुंचाया गया। आज देश और दुनिया जयपुर की पूर्व महारानी गायत्री देवी की जयंती मना रही है। एक ऐसी शख्सियत जो जितनी अपनी सम्मोहक खूबसूरती और रॉयल लाइफस्टाइल के लिए जानी जाती थीं, उतनी ही अपनी फौलादी राजनीतिक इच्छाशक्ति और जन-सेवा के अडिग संकल्प के लिए भी पहचानी गईं।
राजमाता गायत्री देवी मरुधरा की राजनीति का वो 'एक्स-फैक्टर' थीं, जिन्होंने आजाद भारत की सबसे ताकतवर राजनीतिक पार्टी 'कांग्रेस' के सामने न केवल अपनी स्वतंत्र पार्टी खड़ी की, बल्कि दिल्ली के तख्त को बार-बार सीधी चुनौती दी। आज उनकी जयंती के मौके पर हम आपको रूबरू कराने जा रहे हैं उनके उस बेहद रोमांचक, उतार-चढ़ाव से भरे और प्रेरणादायी राजनीतिक सफर से, जो आज भी भारत की हर महिला राजनेता के लिए एक जीवंत मिसाल है।
महारानी गायत्री देवी के व्यक्तित्व में भारत की दो सबसे समृद्ध और बौद्धिक संस्कृतियों का अनूठा मेल था। उनका जन्म एक बेहद ही प्रतिष्ठित और आधुनिक विचारों वाले हिंदू राजपरिवार में हुआ था, जिसके तार बंगाल से लेकर बड़ौदा तक जुड़े हुए थे।
गायत्री देवी के पिता कूचबिहार रियासत (वर्तमान पश्चिम बंगाल) के राजकुमार जितेंद्र नारायण थे। उनके पैतृक वंश में बंगाली और शाही कोच राजवंश का गौरवशाली खून दौड़ रहा था। वहीं उनकी माता बड़ौदा की मराठा राजकुमारी इंदिरा राजे थीं, जो महान मराठा शासक महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय की इकलौती सुपुत्री थीं। इंदिरा राजे अपने दौर की बेहद खूबसूरत और आधुनिक सामाजिक चेतना वाली महिला मानी जाती थीं।
बंगाल पुनर्जागरण (Bengal Renaissance) से नाता: बहुत कम लोग जानते हैं कि गायत्री देवी का जुड़ाव भारत के महान सामाजिक सुधारक और बंगाल पुनर्जागरण के पुरोधा केशव चंद्र सेन से भी था। उनकी दादी सुनीति देवी, सीधे तौर पर केशव चंद्र सेन की सुपुत्री थीं। यही वजह थी कि गायत्री देवी के भीतर बचपन से ही कला, साहित्य, समाज सुधार और लीक से हटकर कुछ नया करने के संस्कार कूट-कूट कर भरे थे।
आजादी के बाद जब देश में राजशाही खत्म हुई और लोकतंत्र का सूरज उगा, तब गायत्री देवी ने महलों की चारदीवारी में कैद रहने के बजाय सक्रिय राजनीति के मैदान में उतरने का फैसला किया। उन्होंने भारत के अंतिम गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी द्वारा स्थापित 'स्वतंत्र पार्टी' (Swatantra Party) की सदस्यता ली और कांग्रेस के एकाधिकार के खिलाफ बिगुल फूंक दिया।
जयपुर लोकसभा का वो महा-संग्राम: सन 1962 के आम चुनाव में गायत्री देवी जयपुर लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरीं। उस दौर में जब महिलाओं का राजनीति में आना बहुत बड़ी बात थी, उन्होंने धूल और रास्तों की परवाह किए बिना मरुधरा के गांवों का दौरा किया।
ऐतिहासिक जीत का कीर्तिमान: इस चुनाव में कुल पड़े 2,46,516 वोटों में से अकेले महारानी गायत्री देवी को 1,92,909 वोट हासिल हुए। यह अपने आप में इतनी विशाल और प्रचंड एकतरफा जीत थी कि उनका नाम सीधे 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में दर्ज हो गया। उन्होंने इस सीट पर लगातार 1967 और 1971 के चुनावों में भी अपनी जीत का परचम लहराया।
महारानी गायत्री देवी केवल चुनाव जीतने वाली नेता नहीं थीं, बल्कि वे सिद्धांतों की पक्की राजनीतिज्ञ थीं। उनके जीवन का एक ऐसा किस्सा है जो आज के दौर के नेताओं को जरूर पढ़ना चाहिए, जो सत्ता के लिए तुरंत अपनी पार्टियां बदल लेते हैं।
1965 का वो ऐतिहासिक वाकया: सन 1965 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने महारानी गायत्री देवी के साथ एक विशेष बैठक की थी। इस बैठक में शास्त्री जी ने गायत्री देवी को कांग्रेस पार्टी में शामिल होने का एक बड़ा और सम्मानजनक प्रस्ताव दिया।
दिलचस्प बात यह थी कि इसी दौरान उनके पति (जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय) को भारत सरकार द्वारा स्पेन का राजदूत नियुक्त किया जा रहा था। किसी भी आम व्यक्ति के लिए सत्ता के इस प्रभाव के सामने झुकना आसान होता, लेकिन गायत्री देवी ने पूरी विनम्रता के साथ शास्त्री जी के इस 'महा-ऑफर' को ठुकरा दिया और अपनी स्वतंत्र पार्टी और वैचारिक सिद्धांतों के साथ डटी रहीं।
सन 1967 का साल राजस्थान की राजनीति के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। इस साल महारानी गायत्री देवी की स्वतंत्र पार्टी ने राजस्थान के भावी जननायक और भारतीय जनसंघ के कद्दावर नेता भैरों सिंह शेखावत के साथ हाथ मिलाया।
| चुनावी वर्ष / कालखंड | निर्वाचन क्षेत्र / घटना | राजनीतिक दल एवं गठबंधन | परिणाम और राजनीतिक प्रभाव (Political Output) |
| वर्ष 1962 (आम चुनाव) | जयपुर लोकसभा सीट | स्वतंत्र पार्टी (Swatantra Party) | गिनीज बुक रिकॉर्ड जीत; 1.92 लाख से अधिक वोट पाकर इतिहास रचा। |
| वर्ष 1967 (विधानसभा चुनाव) | मालपुरा विधानसभा सीट | स्वतंत्र पार्टी + जनसंघ गठबंधन | हार का सामना; कांग्रेस के कद्दावर नेता दामोदर लाल व्यास से चुनाव हार गईं। |
| वर्ष 1967 (लोकसभा चुनाव) | जयपुर लोकसभा सीट | स्वतंत्र पार्टी + जनसंघ गठबंधन | शानदार जीत; विधानसभा हारने के बावजूद लोकसभा सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। |
| वर्ष 1971 (शाही विशेषाधिकार अंत) | प्रिवी पर्स (Privy Purse) की समाप्ति | स्वतंत्र पार्टी (कांग्रेस विरोधी मोर्चा) | राजा-महाराजाओं के सारे शाही भत्ते, विशेषाधिकार और आधिकारिक टाइटल पूरी तरह समाप्त कर दिए गए। |
| जुलाई 1975 (इमरजेंसी काल) | मीसा / कोफेपोसा (COFEPOSA) के तहत गिरफ्तारी | सक्रिय विपक्ष | 5.5 महीने तिहाड़ जेल; टैक्स कानूनों के उल्लंघन के आरोप में जेल भेजी गईं, जिसके बाद राजनीति से संन्यास लिया। |
महारानी गायत्री देवी के जीवन का सबसे कठिन और अग्निपरीक्षा वाला दौर सन 1971 के बाद शुरू हुआ। सन 1971 में तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान संशोधन के जरिए 'प्रिवी पर्स' को पूरी तरह समाप्त कर दिया, जिससे देश के सभी पूर्व राजपरिवारों के शाही भत्ते और विशेषाधिकार छिन गए। लेकिन असली झटका आना अभी बाकी था।
आपातकाल (Emergency) का दंश: जुलाई 1975 में जब पूरे देश में इमरजेंसी लागू की गई, तो विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया। गायत्री देवी भी इंदिरा गांधी के निशाने पर थीं। उन्हें 'कोफेपोसा एक्ट' (COFEPOSA Act) के तहत टैक्स चोरी और विदेशी मुद्रा कानूनों के कथित उल्लंघन के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
तिहाड़ की पांच साढे पांच महीने: जो महारानी कल तक जयपुर के आलीशान महलों में मखमली गद्दों पर सोती थीं, उन्होंने साढ़े पांच महीने दिल्ली की तिहाड़ जेल की एक बेहद साधारण और सर्द कोठरी में बिताए। जेल के इस दंश ने उनके स्वास्थ्य पर भी गहरा असर डाला, लेकिन उनके चेहरे का आत्मसम्मान और गरिमा कभी कम नहीं हुई।
जेल से रिहा होने के बाद गायत्री देवी ने सक्रिय और चुनावी राजनीति को हमेशा-भेशा के लिए अलविदा कह दिया। उन्होंने महसूस किया कि अब लोकतंत्र का स्वरूप बदल रहा है। राजनीति छोड़ने के बाद उन्होंने अपने संस्मरणों को समेटने का फैसला किया।
ऐतिहासिक आत्मकथा का प्रकाशन: सन 1976 में उन्होंने सुप्रसिद्ध लेखिका शांता रामा राव के सहयोग से अपनी बायोग्राफी 'A Princess Remembers' (एक राजकुमारी की यादें) प्रकाशित की। यह किताब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेस्टसेलर साबित हुई। बाद में इस किताब का मराठी भाषा में भी अनुवाद किया गया, जिसे पाठकों ने खूब सराहा।
सिनेमा के पर्दे पर गायत्री देवी: उनके इस अद्भुत और जादुई जीवन दर्शन से प्रभावित होकर मशहूर फिल्म निर्देशक फ्रांस्वा लेवी (Françoise Levie) ने एक शानदार डॉक्यु-फिल्म बनाई, जिसका नाम था 'मेमोयर्स ऑफ अ हिंदू प्रिंसेस' (Memoirs of a Hindu Princess)। इस फिल्म के जरिए दुनिया ने जयपुर की राजमाता के राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों को करीब से देखा।
1999 की वो आखिरी अफवाह: राजनीति से दूर होने के दशकों बाद, सन 1999 के लोकसभा चुनाव के दौरान एक बार फिर देश के सियासी गलियारों में हलचल मच गई। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी 'कूचबिहार तृणमूल कांग्रेस' ने गायत्री देवी को अपनी जन्मभूमि कूचबिहार सीट से लोकसभा का उम्मीदवार घोषित कर दिया और उनके दोबारा राजनीति में आने की अफवाहें तेज हो गईं। हालांकि, राजमाता ने इस प्रस्ताव पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और वे अपने जीवन के अंतिम दिनों तक जयपुर के सामाजिक और शैक्षिक विकास (विशेषकर महारानी गायत्री देवी गर्ल्स स्कूल - MGD) में ही व्यस्त रहीं।