ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई के अनुसार मान्यता है कि शिवजी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने इतनी कठोर तपस्या की कि उनका शरीर काला पड़ गया। तब शिवजी ने प्रसन्न होकर गंगाजल से उनका वर्ण बिजली के समान कांतिमान कर दिया। तभी से माता का नाम गौरी पड़ा। देवी की प्रार्थना करते हुए ऋषि और देवता कह उठे— “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”।

जयपुर. नवरात्र के आठवें दिन मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। मां दुर्गा का यह रूप बेहद मोहक है। दुर्गा सप्तशती में उल्लेख है कि शुंभ निशुंभ से देवताओं की रक्षा देवी महागौरी ने ही की थी।
ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई के अनुसार मान्यता है कि शिवजी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता ने इतनी कठोर तपस्या की कि उनका शरीर काला पड़ गया। तब शिवजी ने प्रसन्न होकर गंगाजल से उनका वर्ण बिजली के समान कांतिमान कर दिया। तभी से माता का नाम गौरी पड़ा। देवी की प्रार्थना करते हुए ऋषि और देवता कह उठे— “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”।
ज्योतिषाचार्य पंडित नरेंद्र नागर बताते हैं कि इनकी आयु आठ वर्ष मानी गई है- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी।' मां महागौरी की चार भुजाएं हैं। एक हाथ अभय मुद्रा और एक हाथ वर-मुद्रा में है। एक हाथ में त्रिशूल है और एक अन्य हाथ में डमरू है। मां महागौरी का वाहन वृषभ है। माता महागौरी के गौर वर्ण को शंख, चंद्रमा अथवा कुंद के समान बताया गया है। वे अन्नपूर्णा भी हैं और उन्हें ऐश्वर्य दायिनी भी कहा जाता है।
महा अष्टमी के दिन देवी महागौरी की पंचोपचार पूजा करना चाहिए। इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है। अष्टमी के दिन कन्या भोज का विधान है. विवाहित महिलाएं मां को चुनरी भेंट करती हैं।
श्लोक
1.
श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः | महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ||
2.
या देवी सर्वभूतेषु माँ गौरी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
हिंदी भावार्थ : हे सर्वत्र विराजमान मां और माता गौरी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।