राजस्थान के एक छोटे से गांव से निकल स्टील किंग बने कारोबारी लक्ष्मी निवास मित्तल का आज जन्मदिन है।
जयपुर। राजस्थान के एक छोटे से गांव से निकल स्टील किंग बने कारोबारी लक्ष्मी निवास मित्तल का आज जन्मदिन है। 15 जून 1950 को राजस्थान के चूरू जिले के सादुलपुर कस्बे में जन्मी ये सख्सीयत आज पूरी दुनिया में किसी परिचय की मोहताज नहीं है।
राजस्थान के एक छोटे से गांव से निकल कर यूके के केन्सिंगटन पैलेस तक का सफर उन्होंने अपनी लगन और मेहनत से तय किया है। फोर्ब्स के अमीरों की सूची में तक में यह शामिल हुए और 2008 में पदम विभूषण अवार्ड से भी नवाजे गए। इनकी आर्सेलर मित्तल कंपनी दुनिया की सबसे बड़ी स्टील उत्पादक कंपनी है। बताया जाता है कि मित्तल का जिस गांव में हुआ वहां 1960 तक बिजली भी नहीं पहुंची थी।
बचपन में वह जमीन पर दरी बिछाकर सोते थे क्योंकि एक छोटे से घर में 25 लोगों रह रहे थे। बाद में उनके पिता मोहनलाल मित्तल कलकत्ता चले गए और एक छोटी सी स्टील मिल लगाई। स्कूल से आने के बाद लक्ष्मी अपने पिता के काम में हाथ बंटाते थे। मित्त्ल में हर परिस्थिति से जुझने का जज्बा गजब का था।
एक बार तो ऐसा हुआ कि कलकत्ता के सेंट जेवियर कॉलेज ने लक्ष्मी मित्तल का एडमिशन करने से मना कर दिया लेकिन किसी तरह उनका एडमिशन हुआ और उन्होंने कॉलेज टॉप कर साबित कर दिया की वह सबसे बेस्ट है। इसके बाद कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और छोटे से गांव से निकल कर विश्व के टॉप 100 धनी वयक्त्यिों में शामिल हो गए।
आज भी चूरू में बसता है स्टील किंग का मन
चूरू में जन्म लेने के कारण लक्ष्मीनिवास मित्तल का मन आज भी चूरू में बसता है। आज मित्तल के जन्मदिन पर खुशी जताते हुए उनके रिश्तेदार, परिवार के लोगों का कहना है कि चूरू में मित्तल लगातार जनहित के काम करवाते रहते है। स्थानीय लोग बताते है कि अभी मित्तल चूरू जिले की बेटियों को कम्प्यूटर का ज्ञान देने के लिए महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं।
सादुलपुर व चूरू स्थित उनकी ओर से संचालित केन्द्रों पर बेटियों को कम्प्यूअर का ज्ञान भी उपलब्ध कराया जा रहा है। उनके इस कम्पयूटर प्रशिक्षण केंद्र पर प्रवेश लेने वाली बेटियों को प्रवेश में 50 फीसदी की छूट दी जाती है। इसके अलावा स्वरोजगार से संबंधित कई कोर्स केन्द्र में करवाए जा रहे हैं।
स्थानीय लोग बताते है कि मित्तल जन्म के बाद तीन बार यहां आ चुके हैं। हालांकि यह बात अलग है कि वह छोटी सी उम्र में ही राजगढ़ से अपने परिवार के सदस्यों के साथ कोलकाता चले गए थे। लेकिन वह पहली बार 1961 में अपने ममेरे भाई केदारमल सरावगी की शादी में राजगढ़ आए थे। दूसरी बार अपने पुत्र आदित्य का जडूला उतरवाने मलसीसर कस्बे में प्रेमगिरी महाराज के मठ में आए और तब मात्र 15 से 20 मिनट अपनी पैतृक हवेली में रुके थे।
तीसरी बार वह 29 जनवरी 2007 को अपनी मां की स्मृति में निर्मित सामुदायिक भवन का उद्घाटन करने राजगढ़ आए थे। इस दौरान उन्होंने अपनी मां गीता देवी की स्मृति में पांच करोड़ रुपए की लागत से बने आधुनिक सुविधाओं से सृजित सामुदायिक भवन के उद्घाटन किया था। स्टील किंग मित्तल के रिश्ते में भाई रामावतार सरावगी ने कहा कि उन्हें गर्व है कि एलएन मित्तल उनके भाई है। सरावगी का मानना है कि चूरू और राजगढ़ के विकास के लिए भावी योजना बनाकर यहां जनहित में काम करेंगे।
-हिमांशु शर्मा