
Inspirational Story: जयपुर. सवाईमाधोपुर की धरती पर एक ऐसा बदलाव जन्मा, जिसने यह साबित कर दिया कि अगर समाज ठान ले तो असंभव भी संभव हो जाता है। यहां मुख्यमंत्री जन सहभागिता योजना केवल सरकारी योजना बनकर नहीं रह गई, बल्कि लोगों के दिलों का आंदोलन बन गई। हर गांव, हर घर और हर व्यक्ति ने इसे अपना सपना समझा।
कुछ साल पहले तक सरकारी स्कूलों में टूटी दीवारें, कम कमरे और सीमित सुविधाएं बच्चों के सपनों को छोटा कर रही थीं। तभी तत्कालीन कलेक्टर सुरेश ओला ने एक अनोखी सोच रखी। उन्होंने किसानों से कहा कि सरसों की तूड़ी जलाने के बजाय उसे बेचें और उस राशि को बच्चों की शिक्षा में लगाएं। साथ ही मृत्यु भोज जैसी परंपराओं में होने वाले अनावश्यक खर्च को रोककर उस बचत को स्कूलों के विकास में लगाने की अपील की। शुरुआत छोटी थी, लेकिन इरादे बड़े थे।
धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए। किसी ने सौ रुपये दिए, किसी ने हजार, तो किसी ने अपनी हैसियत के अनुसार लाखों का योगदान किया। देखते ही देखते यह सहयोग 37 करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया। इस धन से 700 से ज्यादा सरकारी स्कूलों में नए कमरे बने, शौचालय तैयार हुए, फर्नीचर आया, कंप्यूटर लैब और खेल सुविधाएं विकसित हुईं। जो स्कूल कभी उपेक्षित थे, वे अब बच्चों के सपनों के केंद्र बन गए।
इस मुहिम को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान कलेक्टर कानाराम ने 541 भामाशाहों और 29 प्रेरकों को सम्मानित किया। यह सम्मान केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस सोच का था जिसने समाज को एकजुट किया। लोगों ने महसूस किया कि बदलाव सरकार नहीं, मिलकर किया जाता है।
यह कहानी सिखाती है कि विकास के लिए बड़े संसाधन नहीं, बड़ा दिल चाहिए। छोटी-छोटी बचत और सामूहिक प्रयास से शिक्षा का भविष्य संवारा जा सकता है। सवाईमाधोपुर ने दिखा दिया कि जब समाज अपने बच्चों के लिए खड़ा होता है, तो हर स्कूल उम्मीद की उड़ान बन जाता है।