कैलाश सत्यार्थी (Kailash Satyarthi) ने राजस्थान की एक पुरानी घटना को याद किया है। उन्होंने कहा- मै आज शायद जिंदा नहीं होता, अगर माधुरी ने हमारी मदद ना की होती।
Kailash Satyarthi: नोबेल प्राइज विनर कैलाश सत्यार्थी ने राजस्थान की एक पुरानी घटना को याद किया है। उन्होंने इस घटना में जयपुर की माधुरी सिंह की तारीफ की और कहा कि मै आज शायद जिंदा नहीं होता, अगर माधुरी ने हमारी मदद ना की होती। दरअसल, उन्होंने सोशल मीडिया साइट एक्स पर एक पोस्ट को साझा किया है। जिसमें उन्होंने लिखा, "कई साल बाद आज हम जयपुर जाकर माधुरी बहिन और उनके पति धर्मवीर जी से मिले। दोनों गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। 1988 में इस बहिन ने मेरे प्राण बचाने में मदद की थी। राजस्थान के एक प्रसिद्ध मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित था। भारी विरोध के बावजूद हाई कोर्ट की मदद से मैं कई दलित भाइयों को उस मंदिर में प्रवेश दिलाने में सफल रहा।"
"लेकिन भीतर छुपे बैठे कुछ लोगों ने अंदर से दरवाजे बंद करके हम पर लाठियों और लोहे के मूसल से हमला कर दिया। हम घायल पड़े चीखते रहे। पुलिस बाहर खड़ी ताक रही थी। तब हमारी वकील माधुरी सिंह ने दुर्गा का रूप धर अफसरों को ललकारा और दरवाजा तुड़वाकर हमें बाहर निकलवाया। हमें अस्पताल पहुंचाया गया। पहली बार केवट और भीलनी के वंशजों को मूर्ति के दर्शन करने का अधिकार मिला और उनकी लालसा पूरी हुई। ऐसी हैं मेरी बहिन माधुरी!"
1954 में एक साधारण परिवार में जन्मे कैलाश सत्यार्थी एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो समाज में दबी-पिछड़ी व शोषित लोगों के लिए आवाज उठाते रहे हैं। उनके दशकों (1969- 2014) तक किए गए अद्वितीय कार्य के लिए नोबेल प्राइज से नवाजा गया है। सत्यार्थी पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं, हालांकि उन्होंने समाज में फैली भेेदभाव को खत्म करने के लिए अपने आकर्षक कैरियर को छोड़ दिया था। इसके बाद जमीनी कार्यकर्ता के रूप में दशकों तक कार्य करते रहे। कैलाश सत्यार्थी ने जमीनी आंदोलन, बचपन बचाओ आंदोलन अभियान के तहत 83,000 से अधिक बच्चों को शोषण से मुक्त कराया है और उनकी शिक्षा, पुनर्वास और मुख्यधारा के समाज में फिर से शामिल होने के लिए एक सफल मॉडल विकसित किया। उन्हें इस कार्य के लिए भारत सरकार ने सम्मानित किया।