ईरान इस युद्ध का पूरी तरह खात्मा ही चाहता था, केवल युद्धविराम नहीं।
अरुण जोशी, दक्षिण एशियाई कूटनीतिक मामलों के जानकार - अमरीका व ईरान के बीच हुई समझौता वार्ता की विफलता ने पश्चिम एशिया में चल रहे छह सप्ताह लंबे युद्ध को और अधिक जटिल बना दिया है। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समझौते के लिए पर्याप्त प्रयास न करने का आरोप लगा रहे हैं। हालांकि, सीजफायर कायम है, लेकिन इस्लामाबाद वार्ता में कोई ठोस परिणाम नहीं निकलने से सीजफायर की स्थिरता पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। यह भी गंभीर प्रश्न सामने है कि अब अमरीका का अगला कदम क्या होगा? अमरीकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप वार्ता के बाद अपनी टिप्पणियों में ईरान के प्रति काफी सख्त नजर आए हैं। दूसरी ओर, ईरान ने अमरीका पर अपनी संप्रभुता में अनुचित मांगें थोपने और अत्यधिक हस्तक्षेप करने का आरोप लगाते हुए कहा कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। वह फारस की खाड़ी के जलमार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य पर पूर्ण नियंत्रण और वहां से गुजरने वाले जहाजों पर पारगमन शुल्क लगाने का अधिकार चाहता है। ईरान इस युद्ध का पूरी तरह खात्मा ही चाहता था, केवल युद्धविराम नहीं।
दोनों के बीच चरम कड़वाहट भरी स्थिति को देखकर वार्ता का भविष्य इस्लामाबाद में इसके शुरू होने से पहले ही स्पष्ट था। युद्ध के दौरान दोनों पक्षों के बीच धमकियों और जवाबी धमकियों का दौर चलता रहा। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरानी सभ्यता के अंत की बात कही, तो ईरान ने जवाब में खाड़ी देशों- सऊदी अरब, कतर, कुवैत और यूएई में अमरीकी सैन्य ठिकानों को नष्ट करने की धमकी देकर पलटवार किया। इससे पहले वह अमरीकी हमलों के जवाब में अपने महत्वपूर्ण ढांचों और परमाणु ठिकानों पर हुए हमलों का प्रतिशोध भी ले चुका है। वार्ता से पहले ही स्थिति जटिल थी, लेकिन अब यह और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। खासतौर पर पाकिस्तान के लिए, जिसने इन वार्ताओं की मेजबानी कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की थी। लेकिन 20 घंटे से अधिक चली वार्ता के बावजूद कोई सकारात्मक परिणाम न निकलने से पाकिस्तान का सारा जोश काफूर हो गया है। इस विफलता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पाकिस्तान दोनों पक्षों को फिर से बातचीत की मेज पर लाने में प्रभावी भूमिका निभाने में सक्षम नहीं है। भारत युद्धविराम की घोषणा से लेकर इस्लामाबाद वार्ता की नाकामी तक पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए था। ग्लोबल साउथ के एक प्रमुख नेता के रूप में तथा अमरीका व ईरान दोनों के साथ अपने मजबूत एवं रणनीतिक संबंधों के चलते भारत के लिए यह पूरा घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण था। मध्य पूर्व क्षेत्र भारत की ऊर्जा जरूरतों का मुख्य स्रोत है और लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक खाड़ी देशों व ईरान में निवास करते हैं।
इसलिए भारत ने हमेशा युद्ध के शीघ्र अंत की वकालत की। भारत ने भी युद्धविराम की घोषणा का स्वागत किया था और दोहराया था कि कूटनीति को पहला मौका दिया जाना चाहिए, क्योंकि युद्ध किसी भी मुद्दे का समाधान नहीं होते। लेकिन पाकिस्तान की ओर से इन वार्ताओं की मेजबानी की कुछ हलकों में गलत व्याख्या की गई। आलोचकों ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि आखिर भारत कहां है और वह राजनीतिक व कूटनीतिक पूंजी कहां गई, जिसका उल्लेख प्रधानमंत्री अक्सर करते रहते हैं। ये आलोचक इस सच्चाई से बेखबर थे कि महज वार्ताओं की मेजबानी कर लेने से उस देश का पुराना काला चि_ा मिट नहीं जाता, जो भारत और अफगानिस्तान में सीमा पार आतंकवाद को फैलाने के लिए कुख्यात है। ईरान व अमरीका, दोनों ही पाकिस्तान के दोहरे चरित्र के शिकार रहे हैं। पाकिस्तान ने 9/11 के मास्टरमाइंड ओसामा बिन लादेन को शरण और सुरक्षा देकर अमरीका के साथ विश्वासघात किया, वहीं साल 2024 में उसने ईरान के कुछ क्षेत्रों पर बमबारी भी की थी। इसके बावजूद ईरान और अमरीका ने पाकिस्तान को उसकी भौगोलिक स्थिति और चीन के समर्थन के कारण केवल एक मंच के तौर पर चुना था। अब जबकि वार्ता विफल हो चुकी है और दुनिया युद्धरत पक्षों के अगले कदम को लेकर आशंकित है, भारत के धैर्य और कूटनीति की जीत हुई है। आज पूरी दुनिया भारत की ओर एक ऐसे देश के रूप में देख रही है, जिसका सीधा कूटनीतिक हस्तक्षेप इस संकट का समाधान निकाल सकता है। भारत की विदेश नीति ने न केवल पाकिस्तान की कमजोरियों को उजागर किया है, बल्कि वैश्विक परिदृश्य पर उसकी बढ़ती अप्रासंगिकता को भी बेनकाब कर दिया है।