जयपुर

राजस्थान विधानसभा अमृत महोत्सवः गौरवशाली इतिहास के बावजूद घटती बैठकें, बढ़ता हंगामा और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति

राजस्थान विधानसभा के 75वें वर्ष में प्रवेश के साथ अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है।महोत्सव में सदन की गौरवशाली यात्रा, ऐतिहासिक फैसलों और लोकतांत्रिक परंपराओं पर चर्चा होगी।
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Jul 15, 2026
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फोटो: पत्रिका

Rajasthan Assembly 75 Years: लोकतंत्र के 74 वर्ष पूरे कर राजस्थान विधानसभा 75वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। यह वही सदन है जिसने प्रदेश की दिशा तय करने वाले अनेक ऐतिहासिक फैसलों का साक्षी बनने के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत किया। लेकिन आज तस्वीर बदलती दिख रही है। बैठकों की संख्या लगातार घट रही है, हंगामे और राजनीतिक टकराव में जनहित के मुद्दे दब रहे हैं, विधायकों के प्रश्नों के समय पर जवाब नहीं मिल रहे और नौकरशाही भी विधानसभा के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा रही। ऐसे में अमृतकाल के इस पड़ाव पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जनता की सर्वोच्च आवाज बनने वाला सदन अपने मूल दायित्व से दूर होता जा रहा है?

हंगामे में दब गई जनता की आवाज

सार्थक बहसों की जगह राजनीतिक टकराव और आरोप-प्रत्यारोप ने ले ली है। कई बार सदन का बहुमूल्य समय हंगामे की भेंट चढ़ जाता है, जबकि जनता से जुड़े अहम मुद्दे बिना चर्चा के रह जाते हैं।

जवाब में देरी, जवाबदेही पर सवाल

विधायकों के तारांकित और अतारांकित प्रश्नों के उत्तर समय पर उपलब्ध नहीं हो पाते। अधूरे या विलंबित जवाब न केवल सदन की प्रभावशीलता घटाते हैं, बल्कि सरकार की जवाबदेही तय करने की व्यवस्था को भी कमजोर करते हैं।

गंभीरता से नहीं ले रही है नौकरशाही?

विधानसभा से मांगी गई सूचनाओं और जवाबों में लगातार देरी यह सवाल खड़ा करती है कि क्या विभाग और अधिकारी सदन की सर्वोच्च संवैधानिक भूमिका को अपेक्षित महत्व दे रहे हैं। लोकतंत्र में विधानसभा के प्रति जवाबदेही केवल सरकार ही नहीं, प्रशासन की भी समान जिम्मेदारी है।

अनुभव की विरासत हो रही कमजोर

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, वसुंधरा राजे सहित कई वरिष्ठ नेताओं की सीमित उपस्थिति या कम भागीदारी के कारण नए विधायकों को संसदीय परंपराओं और गंभीर बहस की सीख कम मिल पा रही है। सदन का अनुभव धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है।

बैठकें घटीं, 303 से 147 पर पहुंची

पहली और दूसरी विधानसभा में हर वर्ष औसतन 60 बैठकें होती थीं, लेकिन समय के साथ यह संख्या लगातार कम होती गई। कम बैठकें होने से कानून निर्माण, जनहित के मुद्दों पर चर्चा और सरकार की जवाबदेही तय करने के अवसर भी सीमित होते गए। पहली विधानसभा में 303, दूसरी में 305, तीसरी में 268, चौथी में 242, पांचवीं में 200, छठी में 115, सातवीं में 168, आठवीं में 180, नौवीं में 95, दसवीं में 141, ग्यारहवीं में 143, बारहवीं में 140, तेरहवीं में 119, चौदहवीं में 139 और पंद्रहवीं में 147 बैठकें हुई। वर्तमान में जारी सोलहवीं विधानसभा में अब तक 84 ही बैठकें हुई हैं।

पहली विधानसभा के वे पहले दो दिन

पत्रिका गेस्ट राइटर: प्रवीण चन्द्र छाबड़ा, वरिष्ठ पत्रकार

राजस्थान विधानसभा अपनी स्थापना का अमृत महोत्सव मनाने जा रही है। प्रदेश के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण और पहली विधानसभा के पहले दिन से जुड़ी जानकारी अवश्य साझा करना चाहूंगा। यह मेरे लिए गर्व का विषय है कि वर्ष 1952 में पहली विधानसभा के पहले दिन का साक्षी संभवतः प्रदेश का मैं एक मात्र पत्रकार हूं। तब मैं जयपुर से प्रकाशित सायंकालीन अखबार जयभूमि का प्रतिनिधित्व करता था। 22 वर्ष का नौजवान था। प्रथम विधानसभा के प्रथम सत्र की शुरुआत 29 मार्च, 1952 को हुई थी। उस दिन शनिवार था। हवामहल के पास पुरानी विधानसभा, जिसे टाउन हॉल के नाम से जानते हैं, वहां सुबह से पक्ष-प्रतिपक्ष के सदस्यों का जमावड़ा शुरू हो गया था। सदन में सत्ता पक्ष यानी कांग्रेस के सदस्य सफेद टोपियां धारण किए हुए थे तो ही प्रतिपक्ष में रंग-बिरंगे साफे पहने व सूट-बूट में भी नवनिर्वाचित विधायक नजर आ रहे थे।

दूसरी बैठक में विधानसभा अध्यक्ष के रूप में नरोत्तम लाल जोशी और उपाध्यक्ष के रूप में लालसिंह का निर्वाचन हुआ। इस दिन रोचक वाकया यह भी हुआ कि अध्यक्ष जोशी को बधाई देते वक्त विरोधी दल के नेता जसवंत सिंह ने अन्य कांग्रेस सदस्यों की तरह ही सफेद टोपी धारण किए जोशी से मुखातिब होते हुए कहा कि हम लोग जो इधर विपक्ष में बैठे हैं कुछ पार्टी के चिह्न जो आपके साथ हैं उससे झिझकते हैं। आशा है, आप कम से कम सफेद टोपी कल से धारण नहीं करेंगे। यह प्रतिपक्ष के नेता का आसन से निष्पक्ष रहने का आग्रह भर था। मेरा यह भी सौभाग्य रहा है कि मौजूदा मुख्यमंत्री को छोड़कर पिछले सभी मुख्यमंत्रियों से मेरा व्यक्तिगत जुड़ाव रहा।

जनता ऐसे हो सकती है कम

ऑनलाइन पोर्टल: सीधे याचिका का सिस्टम बने।
सार्वजनिक सुनवाईः विधायक जनसुनवाई करें, जिसकी रिपोर्ट सदन में रखें।
जनता का सवालः सत्र में हर दिन जनता की ओर से नेता प्रतिपक्ष एक सवाल पूछे।

इन कानूनों को माना ऐतिहासिक: जिन पर होगी चर्चा

  • भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्ग्रहण, 1952
  • भूदान यज्ञ, 1953
  • कृषि लगान नियंत्रण, 1954
  • काश्तकारी, 1955
  • भूराजस्व, 1956
  • गौशाला अधिनियम, 1958
  • राजस्थान पंचायत समिति एवं जिला परिषद, 1959
  • राजस्थान जमींदारी एवं बिस्वेदारी उन्मूलन, 1959
  • राजस्थान प्राथमिक शिक्षा, 1964
  • सहकारी समितियां, 1965
  • विधानसभा सदस्य (निर्हरता निवारण), 1969
  • अत्यावश्यक सेवाएं अनुरक्षण, 1970 (रेस्मा)
  • ग्रामदान, 1971 लोकायुक्त एवं उप लोकायुक्त, 1973
  • कृषि जोतों पर अधिकतम सीमा अधिरोपण, 1973
  • पासबुक (कृषि जोत), 1983
  • गौवंशीय पशु (वध का प्रतिषेध और अस्थायी प्रवर्जन या निर्यात का विनियमन), 1995
  • राजवित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन, 2005 (एफआरबीएम)
  • राजस्थान लोक सेवाओं के प्रदान की गारंटी, 2011
  • लोक उपापन में पारदर्शिता, 2012 (आरटीपीपी)
  • विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध, 2025

ऐतिहासिक कानून

सूचना का अधिकार, 2000: यह कानून लाने में राजस्थान अग्रणी रहा, लेकिन केंद्र में 2005 में कानून बनने के बाद इसे वापस ले लिया।

ये कानून बने, लेकिन लागू नहीं

कोचिंग (नियंत्रण-विनियमन), 2025
प्लेटफॉर्म आधारित गिग कर्मकार (रजिस्ट्रीकरण और कल्याण), 2023

लौटनी चाहिए सहयोग की पुरानी परंपरा

मैं सत्ता में नहीं रहा, लेकिन सरकार मेरे सुझावों को हमेशा मानती थी। आज कटुता बढ़ गई है। विपक्ष को विकल्प के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। हर सत्र में एक दिन विपक्ष को सदन चलाने का मौका मिलना चाहिए। इससे सहयोग की पुरानी परंपरा लौटेगी।
पं. रामकिशन, पूर्व विधायक

RTI पर पहल की, अब मजबूत करें

राजस्थान ने RTI के लिए अच्छी पहल की, जो ऐतिहासिक प्रयास था। RTI को और मजबूत करने के प्रयास होने चाहिए। सूचना अधिक से अधिक उपलब्ध होनी चाहिए जिससे पारदर्शिता बढ़े और प्रदेश की भावनाओं का सम्मान हो।
हरिमोहन शर्मा, वरिष्ठ विधायक

60 दिन सदन चलाने की पहल करें

सभी विधानसभाओं ने हर साल 60 दिन सदन चलाने और तीन सत्र आयोजित करने का प्रावधान कर रखा है। न्यूनतम बैठकों का प्रावधान भी जोड़ा जाना चाहिए। फिर भी बैठकें बढ़ाने की पहल प्रदेश को करनी चाहिए।
घनश्याम तिवाड़ी, राज्यसभा सदस्य

रिपोर्ट्स पर चर्चा हो, आचरण सुधरे

निजी विधेयकों पर चर्चा की व्यवस्था है। विभिन्न संस्थानों की रिपोर्ट्स सदन में आती हैं, उनके आधार पर समीक्षा होनी चाहिए। सदनों में आचरण का मुद्दा बड़ा है।
डॉ. सी.पी. जोशी, पूर्व अध्यक्ष, राज. विधानसभा

Updated on:
15 Jul 2026 10:22 am
Published on:
15 Jul 2026 10:20 am