
रायचूर. वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ रायचूर के तत्वावधान में वर्षावास के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में जैन समणी डॉ. सुयशनिधि, जैन समणी सुयोगनिधि के सानिध्य में ज्ञानावरणीय कर्म के स्वरूप और प्रभाव पर मार्गदर्शन दिया गया। डॉ. सुयशनिधि ने कहा कि ज्ञान आत्मा का स्वभाव है, लेकिन ज्ञानावरणीय कर्म उसके प्रकाश को ढक देता है। जिस प्रकार दीपक में प्रकाश होते हुए भी आवरण के कारण दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार कर्मों के प्रभाव से आत्मज्ञान की पूर्ण अभिव्यक्ति बाधित होती है। उन्होंने कहा कि ज्ञान और ज्ञानी की निंदा, ज्ञान को छिपाना, ज्ञान-वाणी के प्रति अविनय, उपेक्षा और द्वेषपूर्ण व्यवहार ज्ञानावरणीय कर्म के बंध के प्रमुख कारण हैं। ज्ञान का अपमान अंतत: व्यक्ति की समझ, स्मृति और निर्णय क्षमता को प्रभावित करता है। गोशालक और भगवान महावीर के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने ज्ञान, विनय और कर्म के संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि सांसारिक उन्नति के लिए व्यावहारिक ज्ञान, जबकि आत्मिक उन्नति के लिए आध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है। विनय, स्वाध्याय, आत्मचिंतन, ध्यान और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा से कर्मावरण को कमजोर किया जा सकता है। प्रवचन के बाद पवन नाहर ने मंच संचालन किया। नवकार आराधना तप में करीब 50 श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता की। 29 अगस्त को आध्यात्मिक रक्षाबंधन तथा विद्यार्थियों के लिए ‘स्मृति जादू’ विशेष सत्र आयोजित होगा।