जयपुर

‘सबसे सुंदर गीत अभी लिखा ही नहीं गया…प्रसून जोशी बोले- AI एक्सटेंशन है, एक्सप्रेशन नहीं

सबसे सुंदर गीत अभी लिखा ही नहीं गया है... जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2026 में जब प्रसून जोशी ने यह बात कही तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) डेटा और एल्गोरिद्म पर आधारित हो सकता है, लेकिन रचनात्मकता की असली जड़ें भावनाओं, अनुभवों और ‘अव्यक्त को व्यक्त’ करने की मानवीय क्षमता में हैं।
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Jan 18, 2026
Prasoon Joshi
गीतकार प्रसून जोशी।

गीतकार प्रसून जोशी ने AI पर बात करते हुए कहा कि इसे ‘आर्टिफिशियल’ कहना ही गलत है क्योंकि यह मानव अनुभव से निकले डेटा पर टिका है। उनका कहना था कि AI के पास वह सब है जो कहा जा चुका है, जबकि इंसान के पास वह है जो अभी कहा जाना बाकी है। इस विचार के जरिए उन्होंने रचनात्मकता को अनुभव और भावनाओं की उपज बताया, न कि केवल भाषा की संरचना या तकनीकी बनावट का परिणाम।

यह बातचीत राजस्थान पत्रिका की ओर से आयोजित ‘Imagine the New Horizons of Creativity’ सत्र में हुई। इस दौरान जोशी ने अपनी रचनात्मक यात्रा, भाषा, मातृत्व, तकनीक और विज्ञापन की दुनिया पर विस्तार से चर्चा की।

छोटे शहरों से बड़े मंच तक

प्रसून जोशी ने बातचीत के दौरान बताया कि उनका पहला कविता संग्रह मात्र 17 साल की उम्र में प्रकाशित हो गया था। उन्होंने कहा कि मध्यवर्गीय परिवार से आने वाले किसी भी रचनात्मक व्यक्ति के लिए यह राह आसान नहीं होती और शुरुआती दौर में लगातार संघर्ष करना पड़ता है।

दादी मेरी रोल मॉडल

जोशी ने अपनी दादी को अपना सबसे बड़ा रोल मॉडल बताते हुए कहा कि उत्तराखंड के एक गांव से आने वाली उनकी दादी निरक्षर थीं। कम उम्र में पति का देहांत हो गया था, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और 18-19 साल की उम्र में पढ़ना-लिखना सीखा। बाद में वे एक स्कूल में प्रिंसिपल बनीं और इसी पद से सेवानिवृत्त हुईं। जोशी ने कहा कि उनके सामने दादी जज़्बे, आत्मनिर्भरता और दृढ़ संकल्प की मिसाल थीं।

उन्होंने उत्तराखंड के छोटे कस्बे में बचपन बिताने का अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहाड़ों की प्रकृति, कठिन जीवन और ईमानदारी ने उन्हें तराशा। उन्होंने कहा कि पिता अनुशासन चाहते थे और मां अभिव्यक्ति, और वे दोनों को निराश नहीं कर सकते थे।

'भाषा समाज का आत्मविश्वास'

भाषा पर बात करते हुए उन्होंने याद किया कि एक समय हिंदी बोलने वालों को ‘HMT-Hindi Medium Type’ कहकर कमतर समझा जाता था। उन्होंने कहा कि आज के दौर में वे गर्व से हिंदी में बात करते हैं और भाषा को हीनता नहीं बल्कि अभिव्यक्ति का माध्यम मानते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भाषा किसी समाज का आत्मविश्वास होती है, उसका दबाव नहीं।

सत्र में जोशी ने मातृत्व पर आधारित अपनी कविताए और गीत भी सुनाए, जिनमें ‘लुका-छुपी’ का उल्लेख विशेष रूप से आया। उनकी कविताओं ने कई श्रोताओं को भावुक कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि सबसे सशक्त कविता वही होती है जिसे जिया गया हो, अनुभव किया गया हो, न कि केवल बनावटी शब्दों से रची गई हो।

'जुगाड़' नहीं, इनोवेशन कहिए...

प्रसून जोशी ने 'जुगाड़' शब्द पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि हम नवाचार को जुगाड़ कहकर उसकी अहमियत कम कर देते हैं, जबकि इनोवेशन एक गंभीर और सोच-समझकर किया गया रचनात्मक प्रयास होता है। जुगाड़ और इनोवेशन को एक मानना गलत है। उन्होंने कहा कि रचनात्मकता किसी एक दिन पैदा नहीं होती, बल्कि ये जीवन भर के अनुभवों, संघर्षों और संवेदनाओं से धीरे-धीरे आकार लेती है।

हर इंसान को चाहिए एक जामवंत

सेशन के अंत में प्रसून ने हनुमान और जामवंत की कथा के माध्यम से आत्मविश्वास और स्मरण की शक्ति पर बात की। उन्होंने कहा कि आज हर इंसान को एक जामवंत चाहिए जो उसे याद दिलाए कि वह कौन है और उसकी ताकत कितनी बड़ी है। हमें ऐसे लोगों की जरूरत है, जो हमें हमारी भुजाओं पर गर्व करना सिखाएं और हमारी आंतरिक शक्ति को जगाएं।

Updated on:
18 Jan 2026 05:52 pm
Published on:
18 Jan 2026 05:25 pm