जयपुर

परम करुणावतार भगवान बुद्ध: शांति, दया और मानवता के मार्गदर्शक

यह गणराज्य कोसल राज्य के अधीन था। इनका जन्म नाम सिद्धार्थ रखा गया था। जन्म के सातवें दिन ही इनकी माता महामाया का देहांत हो गया और इनका पालन-पोषण इनकी मौसी गौतमी ने किया। इसी कारण सिद्धार्थ 'गौतम' कहलाए।

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May 01, 2026

इंदुशेखर तत्पुरुष- यूरोप में पुनर्जागरण का आरंभ भले ही 14वीं सदी से प्रारंभ हुआ किन्तु भारत जैसे प्राचीनतम एवं चैतन्य देश में पुनर्जागरण अति प्राचीन काल से होता रहा है, जिसकी झलक हमें कृतयुग, त्रेता, द्वापर आदि सभी युगों के दिखाई देती है। ढ़ाई हजार वर्षों पूर्व यह पुनर्जागरण गौतम बुद्ध के रूप में हुआ, जब उन्होंने धर्म में आयी कुरीतियों और पाखंड का निर्मूलन करने हेतु राज–पाट, सुख–वैभव को त्यागकर ‘धर्म चक्र प्रवर्तन’ किया एवं नवीन धर्म संघ की स्थापना की।वैशाख पूर्णिमा बुद्ध के जीवन की ऐसी दिव्य तिथि है कि इसी दिन उनका जन्म हुआ, इसी दिन बुद्धत्व की प्राप्ति हुई और इसी दिन उनका देह त्याग अर्थात् महापरिनिर्वाण हुआ। भगवान बुद्ध का जन्म लगभग 563 ई.पू. शाक्यवंशी शासक शुद्धोधन और रानी महामाया के पुत्र रूप में हुआ। राजा शुद्धोधन हिमालय की तलहटी में बसे हुए शाक्य गणराज्य के अधिपति थे। शाक्यों की राजधानी कपिलवस्तु थी, जो वर्तमान में भारत नेपाल सीमा पर अवस्थित है। यह गणराज्य कोसल राज्य के अधीन था। इनका जन्म नाम सिद्धार्थ रखा गया था। जन्म के सातवें दिन ही इनकी माता महामाया का देहांत हो गया और इनका पालन-पोषण इनकी मौसी गौतमी ने किया। इसी कारण सिद्धार्थ 'गौतम' कहलाए।

बालक सिद्धार्थ को वीरोचित अस्त्र–शस्त्र विद्या के साथ विविध ज्ञान–विज्ञान एवं कलाओं का अध्ययन कराया गया। राजा शुद्धोधन ने सिद्धार्थ को अत्यंत भोग-विलास मय वातावरण में रखा ताकि वे दुःख और कष्टों का अनुभव न कर सकें। सोलह वर्ष की अवस्था में ही सिद्धार्थ का विवाह कोलिय गण की राजकुमारी यशोधरा से कर दिया। कुछ ही वर्षों में इनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई। किन्तु सांसारिकता में सिद्धार्थ का मन नहीं रमता था। जीवन के सत्य की खोज उनका लक्ष्य बन गया। 29 वर्ष की आयु में उन्होंने घर-बार छोड़ दिया। यह घटना 'महाभिनिष्क्रमण' कहलाती है। बुद्ध ने ज्ञान की प्राप्ति के लिए भांति की साधनाएं की। अनेक आश्रमों, तपोवनों में घूमते हुए वे अन्त में बोधगया के निकट उरुबेल नामक वन में साधना करने लगे। वहीं निरंजना नदी के तट पर एक पीपल के वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए वैशाख पूर्णिमा के दिन उन्हें सम्यकज्ञान की प्राप्ति हुई। बोध प्राप्ति के उपरान्त ही सिद्धार्थ गौतम, 'बुद्ध’के नाम से प्रसिद्ध हुए। बुद्ध की शिक्षाओं का ज्ञान हमें त्रिपिटक ग्रंथों से ही प्राप्त होता है। त्रिपिटक पाली भाषा में रचित तीन ग्रंथों का समूह हैं, जिन के नाम क्रमशः विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक है।

संसार के हित और लोक कल्याण के लिए बुद्ध ने धर्म प्रचार करने का निश्चय किया। वे बोधगया से वाराणसी के निकट ऋषिपत्तन मृगदाव पहुंचे, जो सारनाथ के नाम से जाना जाता है। यहां उन्होंने पहला धर्मोपदेश कर 'धर्मचक्रप्रवर्तन' किया, जिसमें चार आर्यसत्यों का प्रतिपादन किया। यह बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का मूल आधार है। पहला आर्यसत्य है, कि संसार की सभी वस्तुएँ दुःखमय हैं। दूसरा, दुःखों का कारण अवश्य है। अविद्या ही दु:खों का मूल कारण है। तीसरा, दुःखों का निरोध संभव है। अविद्या का निरोध कर देने पर दुःख-निरोध हो जाता है। यही 'निर्वाण' है। चौथा आर्यसत्य है- दुःखों से छुटकारा पाने का मार्ग। बुद्ध ने इसे ही अष्टांगिक मार्ग कहा। जिसमें सम्यक् प्रकार की दृष्टि, संकल्प, वाक्, कर्मांत, आजीव, व्यायाम, स्मृति और समाधि का उल्लेख है। बुद्ध द्वारा स्थापित संघ में जाति, पद, धन आदि सभी भेदभावों को त्यागकर समरसता का भाव रखा गया। बौद्ध धर्म को लोकप्रिय बनाने में इस समानता के सिद्धांत की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस धर्म का द्वार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री और चांडाल आदि सभी के लिए समान रूप से खुला हुआ था। बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ भारतीय सभ्यता और संस्कति का भी विदेशों में प्रसार हुआ। निरंतर धर्म प्रचार करते हुए बुद्ध ने अस्सी वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा के दिन ही कुशीनगर में अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया। इसे ‘महापरिनिर्वाण’ कहा जाता है। सनातन धर्म में गौतम बुद्ध को विष्णु का नौवाँ अवतार माना गया है।

Published on:
01 May 2026 03:44 pm
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