
जयपुर/भरतपुर। पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता विश्वेंद्र सिंह को प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) की अनुशासन समिति द्वारा थमाए गए 'कारण बताओ नोटिस' ने राजस्थान की सियासत में एक नई रार छेड़ दी है। नोटिस मिलने के महज कुछ ही घंटों के भीतर विश्वेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया पर जो पलटवार किया है, उसने कांग्रेस आलाकमान की रातों की नींद उड़ा दी है। सिंह ने बेहद तल्ख लहजे में लिखा: "आप (अनुशासन समिति) अपनी कार्रवाई के लिए स्वतंत्र हैं और मैं अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर स्वतंत्र हूं।"
राजनीतिक जानकारों की मानें, तो यह महज एक असंतुष्ट नेता का तात्कालिक गुस्सा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत कांग्रेस को दी गई खुली चेतावनी है। इस एक बयान ने राजस्थान कांग्रेस के भीतर चल रहे उस अंतर्विरोध को सतह पर ला दिया है, जो आने वाले दिनों में पूर्वी राजस्थान (मत्स्य और बृज क्षेत्र) के सियासी भूगोल को पूरी तरह बदल सकता है।
विश्वेंद्र सिंह राजस्थान की राजनीति में अपने बेबाक और दबंग अंदाज के लिए जाने जाते हैं। नोटिस के जवाब में उनका यह कहना कि "उम्र के इस पड़ाव पर शायद मुझे किसी की नसीहत की जरूरत नहीं है", सीधे तौर पर कांग्रेस के वर्तमान प्रदेश नेतृत्व की कार्यप्रणाली को चुनौती देता है।
देखा जाए तो विश्वेंद्र सिंह ने कांग्रेस के इस दांव को बेहद चतुराई से 'पार्टी बनाम नेता' की लड़ाई के बजाय 'स्वाभिमान बनाम चाटुकारिता' का रंग दे दिया है।
विश्वेंद्र सिंह का यह बयान साफ करता है कि वह कांग्रेस के किसी भी दंडात्मक फैसले (जैसे निलंबन या निष्कासन) से डरने वाले नहीं हैं, बल्कि वे खुद को एक ऐसे मोड़ पर खड़ा कर चुके हैं जहां से वापसी के रास्ते लगभग बंद हो चुके हैं।
इस पूरी जंग का असली केंद्र बिंदु कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और विश्वेंद्र सिंह के बीच की अदावत है। अनुशासन समिति के अध्यक्ष उदयलाल आंजना को टैग करते हुए सिंह ने लिखा कि डोटासरा एक तरफ उन्हें बड़ा भाई बताते हैं और दूसरी तरफ उनके खिलाफ ऐसी 'कारगुजारियां' (नोटिस) की जा रही हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजस्थान कांग्रेस में पिछले कुछ समय से पुराने और कद्दावर क्षेत्रीय क्षत्रपों को दरकिनार कर एक नए संगठनात्मक ढांचे को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है।
विश्वेंद्र सिंह द्वारा भरतपुर और डीग के जिला अध्यक्षों को 'अक्षम' कहना और संगठन सृजन अभियान पर सवाल उठाना इसी नाराजगी का हिस्सा है। उनका यह बयान डोटासरा की संगठनात्मक लीडरशिप पर एक सीधा और तीखा हमला है।
विश्वेंद्र सिंह का यह कहना कि वे अपने भविष्य के लिए स्वतंत्र हैं, तीन बड़े सियासी रास्तों की तरफ इशारा करता है:
घर वापसी या भाजपा से हाथ मिलाना? विश्वेंद्र सिंह का अतीत भाजपा से जुड़ा रहा है और उनकी पत्नी दिव्या सिंह भाजपा से सांसद रह चुकी हैं। पूर्वी राजस्थान में जाट और राजपूत समीकरणों के बीच भाजपा लंबे समय से एक मजबूत स्थानीय चेहरे की तलाश में है। सिंह का यह बयान भाजपा नेतृत्व के लिए एक खुला आमंत्रण हो सकता है कि वे बातचीत के लिए तैयार हैं।
क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभरना: भरतपुर राजघराने का इस पूरे बेल्ट (भरतपुर, डीग, धौलपुर, करौली) में आज भी गहरा सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव है। यदि सिंह किसी दल में नहीं जाते हैं, तो भी वे निर्दलीय उम्मीदवारों का एक मजबूत मोर्चा बनाकर या किसी तीसरे विकल्प के साथ खड़े होकर कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में बड़ी सेंध लगा सकते हैं।
आर-पार की लड़ाई का मानस: सिंह ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वे नोटिस का कोई ऐसा रक्षात्मक जवाब नहीं देने वाले जिससे उनकी राजनीतिक छवि कमजोर हो। वे कांग्रेस को यह मौका देना चाहते हैं कि पार्टी ही उन्हें बाहर का रास्ता दिखाए, ताकि वे जनता के बीच 'शहीद' (Victim) कार्ड खेलकर जा सकें कि सच बोलने के कारण उन्हें प्रताड़ित किया गया।
राजनीतिक दृष्टिकोण से पूर्वी राजस्थान (पूर्वी गेटवे) कांग्रेस का सबसे मजबूत किला रहा है। पिछले चुनावों में इसी क्षेत्र ने कांग्रेस को सत्ता की दहलीज तक पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन विश्वेंद्र सिंह की यह बगावत पार्टी के लिए आत्मघाती साबित हो सकती है:
| राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र | संभावित राजनीतिक और सामाजिक नुकसान |
|---|---|
| जाट मतदाता समीकरण | पूर्वी राजस्थान (भरतपुर-डीग-धौलपुर) के जाट मतदाता परंपरागत रूप से राजघराने के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव रखते हैं। विश्वेंद्र सिंह पर कार्रवाई से जाट समाज का एक बड़ा धड़ा कांग्रेस से छिटक सकता है। |
| स्थानीय निकाय और पंचायत स्तर | भरतपुर नगर निगम के सभापति चुनाव का जो जिक्र नोटिस में है, वह साफ करता है कि जमीन पर कांग्रेस के पार्षद और कार्यकर्ता अभी भी सिंह के इशारे पर चलते हैं, न कि जिला अध्यक्षों के। उनके जाने से नीचे का पूरा कैडर बिखर जाएगा। |
| मनाने की कोशिशें (सचिन पायलट फैक्टर) | राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सुबह सिंह के पोस्ट के तुरंत बाद सचिन पायलट ने उन्हें फोन कर मनाने की कोशिश की थी। पायलट और विश्वेंद्र सिंह के संबंध 2020 की मानेसर बगावत के समय से ही काफी करीबी रहे हैं। ऐसे में सिंह पर कार्रवाई से पार्टी के भीतर आंतरिक गुटबाजी एक बार फिर उग्र रूप ले सकती है। |
एक पहलू यह है कि कांग्रेस आलाकमान इस बार इतनी आक्रामक मुद्रा में क्यों है? सिंह को 7 दिन का अल्टीमेटम देकर पार्टी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब संगठन से बड़ा कोई नेता नहीं है। निकाय चुनावों में पार्टी समर्थित प्रत्याशी का नाम वापस करवाना और भाजपा का निर्विरोध बोर्ड बनवाना - ऐसे गंभीर आरोप हैं जिन्हें कोई भी अनुशासित पार्टी नजरअंदाज नहीं कर सकती।
कांग्रेस इस नोटिस के जरिए यह जताना चाहती है कि वह भीतरघात करने वाले बड़े चेहरों को ढोने के मूड में नहीं है, भले ही इसके लिए उसे चुनावी नुकसान क्यों न उठाना पड़े।
विश्वेंद्र सिंह का यह तीखा और तल्ख बयान 'मैं स्वतंत्र हूं', इस बात का उद्घोष है कि राजस्थान कांग्रेस में एक और बड़े विकेट का पतन लगभग तय है। आने वाले 7 दिन राजस्थान की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। सिंह यदि नोटिस का जवाब नहीं देते हैं या और अधिक आक्रामक रुख अपनाते हैं, तो कांग्रेस उन्हें पार्टी से निष्कासित कर देगी।
लेकिन असली कहानी उसके बाद शुरू होगी। उम्र के इस पड़ाव पर स्वाभिमान की दुहाई देने वाले भरतपुर के इस महाराजा की राजनीतिक बिसात पर अगली चाल क्या होगी, इस पर भाजपा और कांग्रेस दोनों की सांसें टिकी हुई हैं। यह तय है कि विश्वेंद्र सिंह शांत बैठने वाले नेताओं में से नहीं हैं, और उनका यह 'स्वतंत्र भविष्य' कांग्रेस के राजनीतिक भविष्य के लिए बड़ी मुश्किलें खड़ी करने वाला है।