
-शैलेंद्र अग्रवाल
जयपुर: आम उपभोक्ता को जगाने के लिए सरकार 'जागो ग्राहक जागो' का नारा दे रही है, लेकिन उपभोक्ता कल्याण निधि के 2016 के नियमों को लेकर खुद राज्य सरकार नौ साल में भी नहीं जागी। इस बीच वसुंधरा राजे, फिर अशोक गहलोत और अब भजनलाल शर्मा की सरकार आ गई, लेकिन उपभोक्ता न्यायालयों में आए शुल्क और जुर्माने की राशि निधि में जमा ही नहीं कराई गई। हाल यह है कि केंद्र व राज्य सरकार के 20 करोड़ रुपए जमा होने के बावजूद उपभोक्ता कल्याण पर इसमें से मात्र 1.06 करोड़ रुपए ही खर्च किए गए हैं।
इस राशि पर 6 करोड़ रुपए से अधिक ब्याज जमा हो चुका है। मामला उजागर हुआ तो नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) के सामने राज्य सरकार ने निधि में न्यायालय शुल्क व जुर्माने की राशि जमा नहीं करने की भूल स्वीकार की। सीएजी की हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र व राज्य सरकार से आए 20 करोड़ रुपए खाते का उपयोग नहीं होने के कारण सरकारी खाते में ही पड़े रहे। ऐसे में उपभोक्ता कल्याण निधि का मकसद अधूरा रह गया। ऑडिट में यह भी सामने आया कि राज्य सरकार ने केंद्र के दिशानिर्देशों के उलट निधि के लिए निर्धारित निजी निक्षेप (पीडी) खाते की जगह बचत खाते का उपयोग किया।
राज्य सरकार ने जनवरी 2018 में पीडी (निजी निक्षेप) खाता खोला और जुलाई 2018 में ढाई करोड़ रुपए जमा करा दिए। सितंबर 2018 में केंद्र सरकार ने निधि में केंद्रीय सहयोग और राज्य के हिस्से की राशि जमा होने तक के लिए बैंक खाता खोलने की अनुमति दी। 28 सितंबर 2018 से 26 फरवरी 2021 के बीच खाते में केंद्र सरकार के 15 करोड़ और राज्य सरकार के मैचिंग हिस्से के रूप में 5 करोड़ रुपए जमा हो गए। इसके बाद बैंक खाता बंद कर ब्याज सहित पूरी राशि पीडी खाते में जमा कराई जानी थी, लेकिन इस ओर राज्य के उपभोक्ता कल्याण विभाग ने ध्यान ही नहीं दिया। राशि पीडी खाते में ट्रांसफर नहीं होने से इसका सार्वजनिक कार्यों के लिए उपयोग ही नहीं हो पाया।
केंद्र सरकार ने 2010 में हर राज्य के लिए उपभोक्ता कल्याण निधि स्थापित कर उसमें 10 करोड़ रुपए जमा करने का निर्णय किया था। इसमें 75 प्रतिशत राशि केंद्र से और 25 प्रतिशत राज्य सरकार के खजाने से आनी थी। सितंबर 2019 में राशि 10 करोड़ से बढ़ाकर 20 करोड़ रुपए कर दी गई और केंद्रीय उपभोक्ता कल्याण विभाग ने इसकी गाइडलाइन भी जारी कर दी।