
जयपुर। बजरी के खनन पर पूरी तरह पाबंदी के कारण अटके निर्माण कार्यों के लिए राहतभरी खबर है। हाईकोर्ट ने कृषि भूमि से बजरी हटाने और सरकारी परियोजनाओं के लिए बजरी खनन की छोटी अवधि की लीज पर रोक हटाते हुए इस मामले में राज्य सरकार के निर्णय पर मोहर लगा दी है। हालांकि बड़े लीजधारियों के बजरी खनन पर लगी सुप्रीम कोर्ट की रोक जारी रहेगी।
मुख्य न्यायाधीश प्रदीप नांद्रजोग व न्यायाधीश जी आर मूलचंदानी की खंडपीठ ने छोटी अवधि की लीज को चुनौती देने वाली संजय गर्ग की याचिका को खारिज कर दिया है। गर्ग उन 82 लीजधारकों में शामिल हैं, जिनको बजरी खनन के लिए मंशापत्र जारी हो चुके हैं।
कोर्ट ने कहा, इस मामले का 5 हेक्टेयर से कम क्षेत्र वाले मौजूदा लीजधारकों को पर्यावरण स्वीकृति लेने के एनजीटी के आदेश व सुप्रीम कोर्ट में खनन को लेकर लंबित एसएलपी से संबंध नहीं है।सुप्रीम कोर्ट में नदी किनारे से बजरी खनन का मामला है, जबकि हाईकोर्ट में दायर याचिका कृषि व सरकारी भूमि पर बजरी खनन के मामले में है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि निजी काश्त भूमि व सरकारी भूमि से बजरी खनन का आदेश सतत विकास के अनुरूप है। पर्यावरण के संबंध में 15 जनवरी 16 को सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में खनन क्षेत्र से सड़क, पुल, नदी-नाले की दूरी पहले से तय है, जिसमें माउण्टेन, फ्लोरा-फौना व पक्षियों के हितों का ध्यान रखा गया है। कोर्ट ने कहा कि जिला सर्वे रिपोर्ट को चुनौती ही नहीं दी गई है, इसलिए उस पर ध्यान देने की आवश्यकता ही नहीं है। जहां तक सरकारी आदेश की वैधता का सवाल है, जब तक वह कानून के विपरीत न हो उसे वैध माना जाता है। सरकारी परियोजनाओं को पूरा करने के लिए दी जाने वाली लघु अवधि की लीज जनहित में दी जा रही है, जो जनसुविधा की परियोजनाओं के लिए आवश्यक है। इन परियोजनाओं को रोका नहीं जा सकता।
पुनर्भरण अध्ययन की आवश्यकता नहीं
कृषि व सरकारी भूमि से बजरी खनन के लिए बजरी पुनर्भरण के अध्ययन की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट का कहना है कि नदी में बहाव रहता है और उसके कारण बजरी का पुनर्भरण होता है, लेकिन जो छोटी लीज दी जा रही है वहां काश्त और सरकारी भूमि है।