
राजस्थान में स्थानीय लोकतंत्र के सबसे बड़े उत्सव यानी पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव को लेकर कानूनी बाध्यताओं और प्रशासनिक लाचारी के बीच एक बड़ा अंतर्विरोध खड़ा हो गया है। राजस्थान हाई कोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा की अध्यक्षता वाली डिविजन बेंच ने 22 मई 2026 को अपने एक ऐतिहासिक फैसले में राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि आगामी 31 जुलाई 2026 से पहले हर हाल में पंचायती राज और स्थानीय निकायों के चुनाव संपन्न करा लिए जाएं। कोर्ट ने सरकार की उस मांग को पूरी तरह ठुकरा दिया था जिसमें दिसंबर 2026 तक का समय मांगा गया था। लेकिन हाई कोर्ट के इस कड़े आदेश के बाद भी धरातल पर पिछले 48 घंटों में जो प्रशासनिक सुगबुगाहट सामने आई है, वह इशारा कर रही है कि चुनाव अपने तय समय पर होना लगभग मुश्किल सा लग रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण प्रशासनिक मशीनरी द्वारा समय पर होमवर्क पूरा न कर पाना और राज्य निर्वाचन आयोग के पास अंतिम आरक्षण सूचियों का न पहुंचना है। इस स्थिति ने न केवल प्रदेश के लाखों भावी प्रत्याशियों बल्कि राजनीतिक दलों के भीतर भी अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है।
इस पूरे चुनावी चक्रव्यूह में सबसे बड़ा रोड़ा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण का निर्धारण है। हाई कोर्ट की खंडपीठ ने राज्य के ओबीसी आयोग को निर्देशित किया था कि वह आगामी 20 जून 2026 तक स्थानीय निकायों और पंचायतों में ओबीसी जातियों के प्रतिनिधित्व और उनकी जनसंख्या का सटीक सर्वे करके अपनी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपे ताकि उसी के आधार पर सीटों का रोटेशन और आरक्षण की लॉटरी निकाली जा सके।
जानकार सूत्रों और चुनावी एक्सपर्ट्स के अनुसार जमीनी हकीकत यह है कि राजस्थान के तमाम जिला कलेक्टर्स और उनके अधीन काम करने वाले राजस्व व प्रशासनिक अमले के पास इस वक्त भीषण गर्मी के प्रबंधन, पानी-बिजली की आपूर्ति की मॉनिटरिंग और अन्य नियमित कार्यों का अत्यधिक दबाव है। ऐसे में सीमित मानव संसाधनों के रहते मात्र कुछ ही दिनों के भीतर पूरे जिले की प्रत्येक ग्राम पंचायत और शहरी वार्ड स्तर पर जाकर ओबीसी जातियों का एकदम त्रुटिहीन और वैज्ञानिक डेटा जुटाना लगभग असंभव हो रहा है। जब तक यह डेटा कलेक्टर्स से ओबीसी आयोग और आयोग से राज्य सरकार तक नहीं पहुंचेगा, तब तक स्वायत्त शासन विभाग और पंचायती राज विभाग सीटों के आरक्षण का अंतिम नोटिफिकेशन जारी नहीं कर सकते।
इस त्रिकोणीय खींचतान में दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष राज्य निर्वाचन आयोग है। आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को निभाते हुए चुनावी मशीनरी को सक्रिय करने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है। आयोग ने जनवरी से ही प्रारंभिक तैयारियां शुरू कर दी थीं, जिसके तहत ईवीएम मशीनों की फर्स्ट लेवल चेकिंग (FLC) और 25 फरवरी 2026 को अंतिम मतदाता सूचियों का प्रकाशन भी सफलतापूर्वक करवा लिया गया था। यहाँ तक कि पंच और सरपंच के चुनाव मतपेटियों से करवाने के लिए जिलों को मतपेटियों का आवंटन भी कर दिया गया था।
लेकिन अब जब चुनाव कार्यक्रम की मुख्य घोषणा यानी लोक अधिसूचना (Notification) जारी करने का समय नजदीक आ रहा है, तो आयोग के हाथ बंधे हुए हैं। राज्य निर्वाचन आयोग ने पंचायती राज और स्वायत्त शासन विभाग को पत्र लिखकर जल्द से जल्द वार्डवार और सीटवार आरक्षण का फाइनल गजट डेटा उपलब्ध कराने की मांग की है। आयोग के अधिकारियों का कहना है कि जब तक सरकार यह तय करके नहीं देगी कि कौन सी सीट महिला, एससी, एसटी या ओबीसी के लिए आरक्षित है, तब तक चुनाव की तारीखों का आधिकारिक ऐलान और ईवीएम में मतपत्रों की छपाई का काम शुरू नहीं किया जा सकता।
प्रशासनिक अड़चनों के बीच इस पूरे मुद्दे पर राजस्थान के राजनीतिक गलियारों में एक अलग ही खिचड़ी पक रही है। सत्ता के गलियारों में इस बात की गंभीर चर्चा है कि भजनलाल शर्मा सरकार 'वन स्टेट-वन इलेक्शन' (One State One Election) के राष्ट्रीय विजन या किसी अन्य मजबूत तकनीकी व संवैधानिक कारण का हवाला देकर इन स्थानीय चुनावों को कुछ महीनों के लिए आगे खिसकाने की आंतरिक रणनीति पर गंभीरता से विचार कर रही है। सरकार का तर्क है कि बार-बार होने वाले चुनावों से विकास कार्य प्रभावित होते हैं और प्रशासनिक खर्च बढ़ता है।
इस कूटनीतिक रणनीति के बीच भाजपा के वरिष्ठ नेताओं द्वारा जमीनी स्तर पर चलाए जा रहे 'गांव चौपाल' जैसे जनसंपर्क अभियानों को चुनावी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन आधिकारिक तौर पर चुनाव कराने की सुगबुगाहट गायब है।
दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। कांग्रेस प्रदेश नेतृत्व का आरोप है कि भाजपा अपनी गिरती राजनीतिक साख और आंतरिक कलह के डर से स्थानीय ग्रामीण और शहरी मतदाताओं का सामना करने से पूरी तरह भाग रही है और जानबूझकर आरक्षण की रिपोर्ट में देरी करवाकर पंचायतों का फंड अटकाने की साजिश रच रही है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव विश्लेषकों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अब इस मामले में केवल दो ही मुख्य रास्ते बचे हैं, जिन पर आने वाले दिनों में राजस्थान की राजनीति और प्रशासन आगे बढ़ेगा: