
राजस्थान के ग्रामीण और शहरी सियासी गलियारों में पिछले एक साल से जिस सबसे बड़े चुनावी सस्पेंस ने हर राजनीतिक दल और जमीनी कार्यकर्ताओं की सांसें अटका रखी थीं, उस पर आज 26 मई को राजस्थान हाई कोर्ट ने पूरी तरह से अंतिम कानूनी मुहर लगा दी है। राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ ने प्रदेश में समय पर पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय चुनाव नहीं कराए जाने के खिलाफ दायर की गई अवमानना याचिकाओं पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ ने इस पूरे मामले की विस्तृत कानूनी समीक्षा करने के बाद याचिकाकर्ताओं की अवमानना याचिकाओं को पूरी तरह से सारहीन घोषित करते हुए खारिज कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने इसके साथ ही यह भी साफ कर दिया है कि राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को आगामी 31 जुलाई 2026 तक हर हाल में चुनावी प्रक्रिया को पूरा करना ही होगा। इस फैसले के बाद जहां एक तरफ सरकार को अवमानना की कार्रवाई से बड़ी राहत मिली है, वहीं दूसरी तरफ 31 जुलाई की सख्त टाइमलाइन ने प्रशासनिक अमले को पूरी तरह से इलेक्शन मोड में ला खड़ा किया है।
पिछले साल नवंबर 2025 में राजस्थान हाई कोर्ट ने प्रदेश की करीब 439 जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए भजनलाल सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को एक कड़ा निर्देश जारी किया था। उस आदेश के तहत सरकार को 31 दिसंबर 2025 तक वार्डों का परिसीमन और सीमांकन पूरा करना था और किसी भी सूरत में 15 अप्रैल 2026 से पहले चुनाव संपन्न कराने थे।
लेकिन जब 15 अप्रैल 2026 की समय सीमा बीत गई और धरातल पर चुनाव नहीं हो सके, तो विपक्ष और याचिकाकर्ताओं ने इसे न्यायपालिका के आदेश की जानबूझकर की गई अवहेलना माना। इसी को आधार बनाकर कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और गिर्राज सिंह देवंदा ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की गुहार लगाई थी, जिस पर पिछले महीने हाई कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया था।
आज जब इस बेहद संवेदनशील मामले पर जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ के समक्ष अंतिम सुनवाई शुरू हुई, तो अदालत का माहौल पूरी तरह से कानूनी तर्कों से गरमा गया। राज्य सरकार की ओर से पैरवी करने के लिए खुद राजस्थान के महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद कोर्ट रूम में मौजूद थे।
महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने राज्य सरकार का मजबूत पक्ष रखते हुए कोर्ट को बताया कि सरकार की मंशा चुनाव टालने की कतई नहीं थी, बल्कि प्रशासनिक मजबूरियों और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट में हो रही देरी के कारण 15 अप्रैल तक चुनाव कराना तकनीकी रूप से संभव नहीं हो सका था। सरकार की ओर से कोर्ट में एक विशेष प्रार्थना पत्र भी पेश किया गया था, जिसमें चुनावी डेडलाइन को आगे बढ़ाने की मांग की गई थी।
अदालत ने सरकार की दलीलों और बदले हुए घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए पाया कि चूंकि कोर्ट पहले ही अपनी मुख्य रिट याचिका में चुनाव कराने की नई अंतिम तारीख 31 जुलाई 2026 तय कर चुका है, इसलिए अब पुरानी डेडलाइन (15 अप्रैल) को लेकर दायर की गई अवमानना याचिकाओं का कोई कानूनी औचित्य नहीं रह जाता है। इसी आधार पर खंडपीठ ने एडवोकेट प्रेमचंद देवंदा और पुनीत सिंघवी की दलीलों को दरकिनार करते हुए दोनों अवमानना याचिकाओं को पूरी तरह से निस्तारित और समाप्त कर दिया।
भले ही सरकार आज अवमानना से बाल-बाल बच गई हो, लेकिन हाई कोर्ट का 31 जुलाई 2026 तक चुनाव संपन्न कराने का आदेश अब भी एक बहुत बड़ी और अचूक लक्ष्मण रेखा की तरह सरकार के सामने खड़ा है। राजनीतिक और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि अब चुनाव आयोग और सरकार के पास तैयारियों के लिए महज 40 से 50 दिनों का ही समय बचा है, जो कि सामान्य तौर पर 3 महीने चलने वाली चुनावी प्रक्रिया के लिहाज से बेहद कम है।
इस समय सीमा के भीतर चुनाव कराने में मुख्य रूप से प्रशासनिक चुनौतियां सामने आने वाली हैं:
सुरक्षा बलों की भारी कमी का पेंच: राजस्थान निर्वाचन आयोग के प्रारंभिक आकलन के अनुसार, प्रदेश भर के गांवों और शहरों में एक साथ शांतिपूर्ण मतदान कराने के लिए कम से कम 150000 पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों की सख्त जरूरत पड़ेगी। जबकि गृह विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राजस्थान सरकार वर्तमान में केवल 80000 पुलिसकर्मी ही उपलब्ध कराने की स्थिति में है। ऐसे में बाकी की फोर्स पड़ोसी राज्यों या केंद्रीय रिजर्व बलों से मंगवानी होगी, जिसमें एक लंबा समय लगता है।
वोटर लिस्ट और परिसीमन का काम: हाई कोर्ट ने अपने निर्देशों में साफ कहा है कि 20 जून 2026 तक सभी ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों के परिसीमन, सीमांकन और अंतिम वोटर लिस्ट का प्रकाशन हर हाल में पूरा हो जाना चाहिए। हालांकि, निर्वाचन आयोग के सूत्रों का कहना है कि वोटर लिस्ट का काम काफी हद तक पूरा हो चुका है, लेकिन उसे नए सिरे से री-वेरिफाई करने में समय लगेगा।
राजस्थान की सियासत को करीब से देखने वाले विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे चुनाव स्थगन के पीछे असली खेल ओबीसी (OBC) आरक्षण की सीटों के निर्धारण का है। भजनलाल सरकार ने पूर्व में ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग के कार्यकाल को बढ़ाकर आगे कर दिया था, क्योंकि सरकार का तर्क था कि बिना सटीक ओबीसी डेटा के जमीनी स्तर पर सीटों का सही आरक्षण तय करना मुमकिन नहीं है।
हाई कोर्ट ने 22 मई के अपने एक अन्य आदेश में ओबीसी कमीशन से साफ कहा है कि वह अपनी अंतरिम रिपोर्ट 20 जून 2026 से पहले सरकार को सौंपे। इसके साथ ही कोर्ट ने एक बेहद तल्ख और तीखी टिप्पणी करते हुए यह भी कह दिया है कि यदि ओबीसी आयोग समय पर अपनी रिपोर्ट सबमिट करने में विफल रहता है, तो निर्वाचन आयोग ओबीसी आरक्षित सीटों को सामान्य (General) सीटें मानते हुए ही 31 जुलाई तक चुनाव की प्रक्रिया को पूरा करा दे।
कोर्ट की इस सख्त लाइन ने सरकार और ओबीसी वर्ग के नेताओं के बीच एक नई बेचैनी पैदा कर दी है, क्योंकि कोई भी राजनीतिक दल बिना ओबीसी आरक्षण के चुनाव में जाने का रिस्क नहीं लेना चाहता। इसके अलावा, बीजेपी सरकार प्रदेश में 'वन स्टेट वन इलेक्शन' यानी पंचायत और निकाय चुनाव एक साथ कराने की अवधारणा पर भी काम कर रही है, जिसके कारण भी व्यवस्थाएं काफी पेचीदा हो गई हैं।
भले ही प्रशासनिक स्तर पर चुनाव कराने में कई तरह की अड़चनें और सुरक्षा बलों की कमी दिखाई दे रही हो, लेकिन सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने सांगठनिक स्तर पर इस चुनाव को फतह करने के लिए पर्दे के पीछे अपनी बिसात बिछाना बहुत पहले ही शुरू कर दिया था।
मई 2026 के इस तपते महीने में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पूरे प्रदेश में 'ग्राम विकास चौपाल' और 'रात्रि विश्राम' जैसे बेहद आक्रामक और जमीनी जनसंपर्क अभियानों की शुरुआत की है। सीएम खुद अब तक डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़ और अजमेर के पुष्कर जैसे ग्रामीण इलाकों का दौरा कर चुके हैं, जहां वे सीधे गांव की चौपालों पर बैठकर ग्रामीणों की समस्याएं सुन रहे हैं और वहीं रात गुजार रहे हैं।
राजनीतिक पंडित इसे सीधे तौर पर जुलाई में होने वाले संभावित पंचायत चुनावों की जमीनी तैयारी से जोड़कर देख रहे हैं। मुख्यमंत्री के अलावा सरकार के सभी कैबिनेट मंत्रियों और संगठन के पदाधिकारियों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने प्रभार वाले जिलों के ग्रामीण अंचलों में जाकर सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का फीडबैक लें और कार्यकर्ताओं को रिचार्ज करें।