जयपुर

पंचायतीराज का सफरनामा: नागौर से आगाज के बाद 16 साल तक थमे रहे चुनाव; ऐसी रही राजस्थान में पंचायती राज की चुनावी राह

Rajasthan Panchayati Raj History: राजस्थान में 1959 में नागौर से शुरू हुए पंचायती राज का सफर कई उतार-चढ़ाव से गुजरा। जानिए कैसे कभी 16 साल तो कभी चार साल तक पंचायत चुनाव नहीं हुए और 1981 में चुनावों के जरिए व्यवस्था को फिर गति मिली।
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Oct 10, 2026
Rajasthan Panchayati Raj History
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जयपुर. पंचायत राज की शुरुआत भले ही राजस्थान के नागौर से हुई हो, लेकिन चुनावों को लेकर पंचायत संस्थाओं की राह काफी उतार-चढ़ाव वाली रही। भारत के लोकतंत्र की सबसे पहली सीढ़ी पंचायती राज संस्थाओं की नींव पड़ने के बाद पहले तीन दशक में एक बार 16 वर्ष तक और बाद में चार साल तक चुनाव ही नहीं कराए गए। कभी नियमित चुनावों से गांवों में लोकतांत्रिक भागीदारी मजबूत हुई तो कभी लंबे अंतराल ने इस व्यवस्था की जड़ों को बेहद कमजोर किया। अशोक मेहता समिति के अनसार इस पंचायतराज यात्रा को मोटे तौर पर तीन चरणों में बांटा जा सकता है: उत्साह, ठहराव और गिरावट।

जोश, ठहराव और गिरावट… 3 चरण

पहला चरण (1959-64) जोश इच्छाशक्ति शुरुआती दौर सरकार की इच्छाशक्ति से उत्साहजनक रहा। यह उत्साह धीरे-धीरे ठंडा पड़ने लगा।

दूसरा चरण (1965-69) ठहराव पंचायती राज यथास्थिति में आ गया। बदलाव का यह दूसरा चरण ठहराव का दौर था।

तीसरा चरण (1970-77) गिरावट इस दौरान किसी न किसी आधार पर पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव टाले गए। फरवरी 1978 में केवल ग्राम पंचायतों के चुनाव हुए, पंचायत समितियों और जिला परिषदों के नहीं हुए। नतीजा यह रहा कि गांवों में निर्वाचित नेतृत्व की जगह प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ता चला गया। 16 साल के लंबे अंतराल तक चुनाव नहीं होने से राजस्थान में पंचायती राज को गहरा धक्का लगा। सत्ता प्रशासक के रूप में सरकारी अमले के पास चली गई।

मेहता समिति… अशोक मेहता समिति ने जिला और मंडल स्तर पर द्वि-स्तरीय प्रणाली स्थापित करने की सिफारिश की। साथ ही नियमित चुनाव कराने और अनिवार्य रूप से कर लगाकर इन संस्थाओं को सौंपने के सुझाव दिए। जिला परिषद को जिला कार्यकारी इकाई मानने की सिफारिश की गई। पूर्ववर्ती त्रिस्तरीय व्यवस्था जारी रखने का समर्थन किया गया।

31 दिन में चुनावः पुनर्जीवन की किरण

1981 के अंत में शिवचरण माथुर सरकार ने पंचायती राज के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई और राज्य को 20 संकल्प कार्यक्रम दिया। पहला संकल्प था पंचायती राज संस्था, नगरपालिका और सहकारी संस्थाओं के चुनाव, जिसके तहत 10 दिसंबर 1981 से 10 जनवरी 1982 तक, केवल 31 दिन में चुनाव कराए गए। ग्राम पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों का गठन हुआ और पुनर्जीवन की प्रक्रिया शुरू हुई। 1981 में चुनाव कराना अपने आप में उपलब्धि थी। इसके बाद 30 जनवरी 1982 को बीकानेर में पंचायती राज सम्मेलन हुआ, जिसमें सुदृढ़ीकरण के लिए घोषणाएं की गईं। फिर 19-20 जुलाई 1983 को भीलवाड़ा में प्रमुखों व प्रधानों के सम्मेलन में इन संस्थाओं को कार्य और शक्तियां हस्तांतरित करने के निर्णय लिए गए। पंचायत समितियों के कर्मचारियों में भी वृद्धि की गई।

फिर वही गिरावट…

राजस्थान में चार साल तक चुनाव नहीं हुए। इससे ग्रामीणों को निराशा हुई। उस दौर में महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल अपवाद रहे, जहां पंचायती राज संस्थाएं प्रभावी बनी रहीं।

1988: एक और शुरुआत

संस्थाओं की अवधि दो बार बढ़ाए जाने के बाद जून-जुलाई 1988 में चुनाव करवाए गए और नई संस्थाओं का गठन हुआ। एक बार फिर पंचायती राज को सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दौर में जी.वी.के. राव समिति ने देश भर में चल रहे विकास कार्यक्रमों और गरीबी उन्मूलन योजनाओं की समीक्षा की और उन्हें फलदायी बनाने के सुझाव दिए। इनमें पंचायती राज संस्थाओं को पुनर्जीवित करने का सुझाव भी शामिल था।

Updated on:
10 Oct 2026 11:48 am
Published on:
10 Oct 2026 11:48 am