जयपुर

Rajasthan Petrol Pump Strike : ‘बेमियादी हड़ताल’ पर पेट्रोलियम डीलर्स V/S तेल कंपनियां, दलीलों में कौन सही – कौन गलत?

राजस्थान में 1 जून से पेट्रोल पंपों की हड़ताल पर HPCL का बड़ा बयान। तेल कंपनियों ने कहा- राज्य में ईंधन की कोई कमी नहीं, ड्रम में डीजल पर रोक और लिमिट के दावे गलत।

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May 28, 2026
Rajasthan Petrol Pump Strike - AI Image

राजस्थान में आगामी 1 जून 2026 से होने वाली पेट्रोल पंपों की अनिश्चितकालीन हड़ताल को लेकर राज्य के प्रशासनिक और व्यापारिक गलियारों में मची हलचल के बीच एक नया और बड़ा मोड़ आ गया है। राजस्थान पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन (आरपीडीए) द्वारा सरकार और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के खिलाफ मोर्चा खोले जाने के बाद अब सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुख तेल कंपनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) ने इस पूरे मामले पर सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया दी है। एचपीसीएल ने मीडिया रिपोर्टों और आरपीडीए के 23 मई 2026 के पत्र का हवाला देते हुए साफ किया है कि राजस्थान में तेल कंपनियों की तरफ से आपूर्ति में किसी भी प्रकार की कोई कटौती नहीं की गई है। कंपनी के अनुसार, राज्य भर के पेट्रोल पंपों को उनकी मांग के अनुसार पेट्रोल (MS) और डीजल (HSD) की निर्बाध आपूर्ति की जा रही है। तेल कंपनियों के इस जवाबी रुख के बाद अब राजस्थान में डीलर्स और कॉर्पोरेट प्रबंधन के बीच सीधा टकराव सामने आ गया है, जिससे आने वाले दिनों में आम जनता के लिए ईंधन की उपलब्धता को लेकर हालात बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है।

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HPCL का स्पष्टीकरण: सप्लाई की कोई कमी नहीं, सब सामान्य

तेल कंपनियों की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि राजस्थान के भीतर तेल वितरण नेटवर्क पूरी तरह से सुचारू है। एचपीसीएल ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, "हम मीडिया में चल रही उन खबरों को स्पष्ट करना चाहते हैं जो राजस्थान पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन के पत्र और 1 जून 2026 से प्रस्तावित हड़ताल के संबंध में हैं। वर्तमान में राजस्थान में तेल विपणन कंपनियों की ओर से आपूर्ति की कोई कमी नहीं है।"

कंपनी ने आगे स्पष्ट किया कि पूरे राज्य में पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए रिप्लेनिशमेंट यानी दोबारा स्टॉक भरने का काम सामान्य रूप से चल रहा है। प्रत्येक डीलर की दैनिक बिक्री, जिला स्तर पर स्टॉक की स्थिति और टर्मिनल पर तेल की उपलब्धता की नियमित रूप से समीक्षा की जा रही है। तेल कंपनियों का दावा है कि वे राज्य सरकार के साथ 'स्टेट लेवल कोऑर्डिनेटर' (SLC) तंत्र के माध्यम से दैनिक आधार पर यह सारा डेटा साझा कर रही हैं, ताकि किसी भी जिले में कृत्रिम किल्लत की स्थिति उत्पन्न न हो।

''लिमिट'' के दावों को कंपनियों ने बताया गलत

Petrol Pump (AI PIC)

इससे पहले राजस्थान पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने तेल कंपनियों पर कई गंभीर और व्यावहारिक आरोप लगाए थे। आरपीडीए का कहना था कि कंपनियों ने अघोषित रूप से यह नियम लागू कर दिया है कि कोई भी पंप संचालक किसी ग्राहक को एक बार में 4,900 रुपये से अधिक का पेट्रोल और 200 लीटर से अधिक डीजल नहीं देगा। इसके अलावा, खरीफ की फसल की बुआई के सीजन से ठीक पहले ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को ड्रम या गैलन में डीजल देने पर पूरी तरह रोक लगाने का भी आरोप डीलर्स ने लगाया था।

इन आरोपों पर कड़ा रुख अपनाते हुए एचपीसीएल ने अपने बयान में कहा, "ब्रांडेड ईंधन की जबरन डिलीवरी करने और किसानों को ड्रम में ईंधन की आपूर्ति पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े जितने भी दावे किए जा रहे हैं, वे पूरी तरह से गलत हैं। यह बातें वास्तविक परिचालन स्थिति को नहीं दर्शाती हैं।"

तेल कंपनियों ने आम जनता और उपभोक्ताओं से अपील की है कि वे इस तरह की किसी भी अफवाह या असत्यापित रिपोर्टों पर भरोसा न करें और अपनी सामान्य खपत के पैटर्न को ही जारी रखें, क्योंकि पैनिक बाइंग यानी डर के मारे ज्यादा तेल खरीदने से बाजार का संतुलन बिगड़ सकता है।

'अधिकतर मुद्दे राज्य सरकार से संबंधित'

Petrol Pump in Jaipur - File PIC

तेल विपणन कंपनियों ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि डीलर्स एसोसिएशन द्वारा उठाए गए अधिकांश मुद्दे सीधे तौर पर तेल कंपनियों के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते, बल्कि वे राजस्थान सरकार के नीतिगत फैसलों से जुड़े हुए हैं। इसमें मुख्य रूप से पड़ोसी राज्यों के मुकाबले राजस्थान में वैट (VAT) की दरों का अधिक होना और सरकारी दौरों का बकाया भुगतान शामिल है।

HPCL ने बताया कि इन समस्याओं के समाधान के लिए पिछले सप्ताह ही राजस्थान सरकार के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक आयोजित की जा चुकी है। इस बैठक में तेल कंपनियों के प्रतिनिधियों ने राज्य सरकार के समक्ष यह बात स्पष्ट कर दी थी कि पूरे प्रदेश में ईंधन की आपूर्ति पूरी तरह से सामान्य, स्थिर और अबाधित है। तेल कंपनियां स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और राजस्थान में निर्बाध ईंधन उपलब्धता और बेहतर ग्राहक सेवा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

... इधर डीलर्स अपनी मांगों पर कायम

Petrol Pump In Jaipur - File PIC

तेल कंपनियों की सफाई के बावजूद राजस्थान पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन अपने रुख पर कायम है। डीलर्स का कहना है कि कंपनियों द्वारा लगाए गए मौखिक और संदेशों के माध्यम से दिए गए निर्देश पूरी तरह से जमीनी हकीकत का हिस्सा हैं। एसोसिएशन के अनुसार, जब तेल कंपनियों के अधिकारी डिपो में 30 प्रतिशत स्टॉक होने की शर्त रखते हैं या टैंक पूरी तरह खाली होने के बाद ही गाड़ी भेजने की हठधर्मिता दिखाते हैं, तो व्यावहारिक रूप से पंप ड्राई हो जाते हैं।

एसोसिएशन का तर्क है कि 4,900 रुपये की सीमा तय करना सीधे तौर पर एमएसएचएसडी कंट्रोल एक्ट 2005 और कंट्रोल एक्ट 2000 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जब बड़े व्यावसायिक ट्रकों, बसों या कृषि वाहनों को इस सीमा के कारण ईंधन देने से मना किया जाता है, तो पेट्रोल पंपों पर आए दिन ग्राहकों और कर्मचारियों के बीच झगड़े होते हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने का खतरा हर समय बना रहता है।

कार्यप्रणाली-भारी जुर्माने से नाराज हैं पंप संचालक

Petrol Pump in Jaipur - File PIC

पेट्रोल पंप संचालकों की नाराजगी का एक बड़ा कारण विधिक माप विज्ञान विभाग (तौल-माप विभाग) के अधिकारियों की दंडात्मक कार्यप्रणाली भी है। आरपीडीए का कहना है कि डिस्पेंसिंग मशीनों में होने वाली मामूली तकनीकी त्रुटियों को भी इस तरह पेश किया जाता है जैसे डीलर जानबूझकर चोरी कर रहा हो। विभाग द्वारा साल भर के आंकड़ों की काल्पनिक गणना करके स्थानीय मीडिया में बड़े-बड़े आंकड़े छपवा दिए जाते हैं, जिससे समाज में डीलर्स की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचती है।

तकनीकी पक्ष रखते हुए डीलर्स ने कहा कि भारत में कोई भी डिस्पेंसिंग मशीन 100 प्रतिशत त्रुटि रहित नहीं हो सकती। विधिक माप विज्ञान के निदेशक के 5 दिसंबर 2023 के पत्र के अनुसार भी 25 एमएल (+/-) की तकनीकी त्रुटि को संज्ञेय माना गया है। डीलर्स ने उदाहरण दिया कि 11 मार्च 2026 को जोधपुर के एक पंप का सत्यापन स्थानीय विधिक माप अधिकारी (LMO) द्वारा किया गया था, लेकिन सिर्फ 3 दिन बाद 14 मार्च 2026 को सतर्कता दल ने आकर उसी मशीन में शॉर्ट डिलीवरी बताते हुए भारी जुर्माना लगा दिया।

''... तो सारा दोष डीलर पर क्यों?"

Petrol Pump in Jaipur - File PIC

एसोसिएशन ने इस नीतिगत विसंगति पर सबसे ज्यादा आपत्ति जताई है कि पेट्रोल पंप संचालक इन मशीनों के मालिक या विनिर्माता नहीं बल्कि केवल 'संरक्षक' (Custodians) होते हैं। इन मशीनों की खरीद, उनकी समय-समय पर मरम्मत और तकनीकी रख-रखाव की पूरी कानूनी जिम्मेदारी संबंधित तेल कंपनियों की होती है। कंपनियों के अधिकृत फिटर ही मशीनों को कैलिब्रेट कर सकते हैं क्योंकि इसके लिए आवश्यक 'के-फैक्टर' (K-Factor) और वन-टाइम पासवर्ड (OTP) केवल कंपनियों के पास ही आता है।

इसके बावजूद, यदि किसी मशीन में 26 एमएल या 27 एमएल की कम आपूर्ति पाई जाती है, तो कानूनी कार्रवाई केवल डीलर के खिलाफ की जाती है, जबकि तेल कंपनियों को छोड़ दिया जाता है। मैसर्स विनायक इंडियन ऑयल जयपुर के मामले का हवाला देते हुए डीलर्स ने बताया कि बिना किसी अपील की सुनवाई के सतर्कता दल द्वारा एक ही दिन में 25,000 रुपये का जुर्माना थोप दिया गया, जो पूरी तरह से प्रशासनिक हठधर्मिता को दर्शाता है।

सरकार दूर करे गतिरोध : EPDF

इधर एम्पॉवरिंग पेट्रोलियम डीलर्स फाउंडेशन (EPDF) के सदस्य और रिस्पॉन्सिबल मेंटर हेमंत सिरोधी ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर इस गंभीर विषय में तुरंत हस्तक्षेप करने और गतिरोध ख़त्म करने का आग्रह किया है। सरकार को लिखे पत्र में सार्वजनिक रूप से एक स्पष्ट और कानूनी रूप से वैध लिखित नीति/एडवाइजरी जारी करने की अपील की गई है। 
पत्र में लिखा गया है कि प्रशासन और तेल कंपनियों के विरोधाभासी बयानों में सामंजस्य स्थापित करते हुए यह साफ किया जाए कि क्या किसी तरह की पाबंदी लागू है या नहीं? साथ ही, ये भी अपील की गई है कि स्पष्ट नियमों के अभाव में वैध तरीके से ईंधन बेचने वाले पेट्रोल पंप संचालकों को जिला स्तर पर होने वाली किसी भी मनमानी पूछताछ या दंडात्मक कार्रवाई से पूर्ण सुरक्षा प्रदान की जाए, ताकि आवश्यक वस्तुओं के वितरण में पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और कानूनी एकरूपता बनी रहे।

काश्तकारों की बढ़ेगी परेशानी, चरमरा सकती है कृषि व्यवस्था

राजस्थान के ग्रामीण परिदृश्य में जून का महीना कृषि गतिविधियों के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। मानसून के आगमन के साथ ही पूरे प्रदेश में खरीफ की मुख्य फसलों की बुआई शुरू हो जाती है। इस दौरान किसानों को अपने ट्रैक्टरों, सिंचाई के इंजनों और अन्य कृषि उपकरणों को चलाने के लिए बड़े पैमाने पर डीजल की जरूरत होती है। चूंकि खेत पेट्रोल पंपों से दूर होते हैं, इसलिए किसान पारंपरिक रूप से ड्रमों या गैलनों में डीजल भरकर ले जाते हैं।

आरपीडीए का कहना है कि यदि तेल कंपनियां ड्रमों में डीजल देने की मनाही पर अड़ी रहीं, तो किसानों के पास खेतों तक ईंधन पहुंचाने का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा। बुआई के समय पर डीजल न मिलने से सीधे तौर पर राजस्थान के कृषि उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। डीलर्स का कहना है कि पहले ऐसी कोई पाबंदी नहीं थी, लेकिन अब ऐन वक्त पर लगाए जा रहे इन अघोषित नियमों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था संकट में आ सकती है।

सरकारी रैलियों का लाखों का भुगतान बकाया

पंप संचालकों ने अपने ऊपर बढ़ते आर्थिक दबाव का एक और मुख्य कारण उजागर किया है। पूर्व में माननीय प्रधानमंत्री के राजस्थान दौरों और विभिन्न सरकारी रैलियों के दौरान जिला प्रशासन और रसद विभाग (DSO) के निर्देशों पर जो तेल उधार दिया गया था, उसका लाखों रुपये का भुगतान लंबे समय से अटका हुआ है। प्रशासनिक अधिकारी केवल पर्चियां थमा देते हैं और भुगतान के समय बजट न होने का बहाना बनाया जाता है।

चूंकि तेल कंपनियां डीलर्स को बिना एडवांस पेमेंट के एक लीटर तेल भी नहीं देतीं, इसलिए लाखों रुपये सरकारी खातों में ब्लॉक हो जाने से संचालकों के पास वर्किंग कैपिटल की भारी कमी हो गई है। इस समस्या के समाधान के लिए आरपीडीए ने सरकार को सुझाव दिया है कि भविष्य में ऐसी रैलियों के लिए सरकार सीधे तेल कंपनियों से 'क्रेडिट नोट' जारी करवाए। जब भी सरकार के पास बजट आए, वह सीधे कंपनियों को भुगतान कर दे, ताकि छोटे डीलर्स को आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े।

वैट दरों में 5% कटौती की मांग पर कायम एसोसिएशन

राजस्थान के डीलर्स की सबसे पुरानी और नीतिगत मांग डीजल और पेट्रोल पर लगने वाले मूल्य वर्धित कर (VAT) की दरों को तर्कसंगत बनाना है। 25 मई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान सरकार प्रति लीटर डीजल पर 14.16 रुपये और पेट्रोल पर 25.01 रुपये वैट वसूल रही है, जबकि रोड सेस क्रमशः 1.75 रुपये और 1.50 रुपये प्रति लीटर है। दोनों ईधनों को मिलाकर सरकार को प्रति लीटर 42.42 रुपये का भारी टैक्स राजस्व मिल रहा है।

इसके विपरीत, पंजाब, हरियाणा और गुजरात जैसे पड़ोसी राज्यों में वैट की दरें काफी कम होने के कारण वहां ईंधन 7 से 10 रुपये प्रति लीटर तक सस्ता है। स्थिति इतनी विसंगतिपूर्ण है कि सीकर और चूरू जिलों के बीच ही सीएनजी (CNG) की कीमतों में 17 रुपये का बड़ा अंतर है। इस भारी अंतर के कारण श्रीगंगानगर, चुरू, अलवर, भरतपुर और जालोर जैसे सीमावर्ती जिलों के वाहन चालक पड़ोसी राज्यों से तेल डलवाना पसंद करते हैं, जिससे राजस्थान के पेट्रोल पंपों की बिक्री (TKL) लगातार गिर रही है और अंततः राज्य के राजकोष को भी राजस्व का नुकसान हो रहा है। एसोसिएशन की मांग है कि वैट में कम से कम 5 प्रतिशत की कटौती कर इसे पंजाब के समतुल्य किया जाए।

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Updated on:
28 May 2026 09:37 am
Published on:
28 May 2026 09:29 am
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