Rajasthan : उम्र के अंतिम पड़ाव पर रिश्तों का मोल अब खत्म हो रहा है। राजस्थान के एसएमएस अस्पताल में गलत नाम-पते बताकर हर माह 4–5 मरीजों को नाते-रिश्तेदार छोड़ जाते हैं। भर्ती करवाया और फिर मुड़कर कभी नहीं देखते हैं। यहीं है आज के कलयुगी रिश्ते का सच।
Rajasthan : उम्र के आखिरी पड़ाव और बीमारी में जिन अपनों के सहारे की उम्मीद होती है, वही अब बुजुर्गों को अस्पतालों में बेसहारा छोड़ रहे हैं। कोई गलत नाम-पता लिखवाकर भर्ती करवा देता है तो कोई इलाज पूरा होने के बाद भी लेने नहीं आता। कई बुजुर्ग अस्पताल के वार्ड और दरवाजों पर घंटों अपनों का इंतजार करते रहते हैं, लेकिन उनकी राह देखती आंखें आखिरकार मायूसी में बदल जाती हैं।
एसएमएस अस्पताल में ऐसे मामले लगातार सामने आ रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार यहां हर महीने 100 से 200 लावारिस लोग इलाज के लिए पहुंचते हैं। इनमें कुछ सड़क हादसों में घायल होकर तो कुछ भीख मांगते समय चोटिल अवस्था में लाए जाते हैं। लेकिन सबसे दर्दनाक वे मामले हैं, जिनमें अपने ही बुजुर्गों को भर्ती करवाकर हमेशा के लिए छोड़ दिया जाता है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार हर महीने चार से पांच ऐसे केस सामने आते हैं।
कई लोग भर्ती के समय गलत नाम, मोबाइल नंबर और पते तक लिखवा देते हैं ताकि बाद में उनकी पहचान न हो सके। इलाज पूरा होने के बाद जब संपर्क किया जाता है तो परिजन पहचानने से ही इनकार कर देते हैं। यही वजह है कि कुल बेसहारा मरीजों में से लगभग 50 प्रतिशत ही ठीक होने के बाद घर पहुंच पाते हैं।
अस्पताल में बेसहारा मिलने वाले ज्यादातर बुजुर्ग वे होते हैं, जो याददाश्त खो चुके हों या जिनके अंग–भंग हो चुके हों। कई के सिर में गहरी चोट होती है तो कुछ कैंसर, किडनी या लिवर जैसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त होते हैं। लंबा इलाज चलने, देखभाल न कर पाने या आर्थिक कमजोरी के कारण परिजन उन्हें छोड़ जाते हैं। इनमें कई मरीज दूसरे राज्यों से भी होते हैं। कई मामलों में मरीजों की मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं होती, जिससे पहचान मुश्किल हो जाती है।
इन मरीजों के लिए अस्पताल का स्टाफ ही परिवार बन जाता है। डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और अन्य कर्मचारी उनकी देखभाल करते हैं। कुछ नर्सिंग स्टाफ इस काम में बेहद सक्रिय है। ठीक होने के बाद उन्हें वृद्धाश्रम भेजा जाता है। कई लावारिस मरीज इलाज के दौरान ही दम तोड़ देते हैं। उनके शव कई दिनों तक मोर्चरी में रखे रहते हैं। परिजनों का पता न चलने पर प्रोटोकॉल के तहत अंतिम संस्कार कराया जाता है। डॉक्टरों का कहना है कि अपनों की बेरुखी बुजुर्गों को अंदर तक तोड़ रही है। कई बुजुर्ग बार–बार यही पूछते हैं-घर वाले कब आएंगे?
जो भी बेसहारा और असहाय मरीज इलाज के लिए लाए जाते हैं, उनका अस्पताल में निशुल्क इलाज किया जाता है। मरीज के ठीक होने के बाद परिजनों से प्रशासन के माध्यम से संपर्क किया जाता है। यदि परिजन लेने नहीं आते तो मरीज को ‘अपना घर’ एनजीओ के वृद्धाश्रम में भेज दिया जाता है। इसके लिए राज्य सरकार का एमओयू भी है।
डॉ. प्रदीप शर्मा, नोडल प्रभारी, अपनाघर अनुभाग, एसएमएस