जयपुर

शरीर ही ब्रह्माण्ड : एकत्व का सृजन मार्ग… आलेख पर प्रतिक्रियाएं

Reaction On Gulab Kothari Article : पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी के विशेष लेख- एकत्व का सृजन मार्ग... आलेख पर प्रतिक्रियाएं
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May 16, 2026
Gulab Kothari
पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी। फोटो- पत्रिका

Reaction On Gulab Kothari Article : हमारे शरीर होते हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इनका संचालन क्रमश: अपरा प्रकृति, परा प्रकृति और माया करती है। सूक्ष्म शरीर जीवात्मा का क्षेत्र है, प्राणमय कोश है। कारण शरीर मूल में अव्यय पुरुष का, ब्रह्म और माया का क्षेत्र है। इसमें किसी प्रकार की क्रिया नहीं है। सृष्टि का आलम्बन है। क्रिया सूक्ष्म-अक्षर में भी नहीं है, किंतु वह निमित्त कारण है। आलेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से….

गुलाब कोठारी द्वारा प्रस्तुत “एकत्व का सृजन मार्ग” लेख स्त्री और पुरुष के आध्यात्मिक, प्राकृतिक और सृजनात्मक संबंधों को गहराई से समझाने का प्रयास करता है। लेख में स्त्री को सोम और पुरुष को अग्नि का प्रतीक बताते हुए सृष्टि निर्माण की प्रक्रिया को आध्यात्मिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया है। इसमें मानव शरीर, चेतना, प्रकृति और ब्रह्मांड के संबंधों को सरल शब्दों में समझाने का प्रयास दिखाई देता है। लेख भारतीय संस्कृति और दर्शन की उस सोच को उजागर करता है, जिसमें स्त्री और पुरुष को केवल जैविक नहीं, बल्कि ऊर्जा और चेतना के पूरक रूप में देखा गया है। साथ ही यह लेख जीवन, सृजन और आत्मिक संतुलन के महत्व को भी रेखांकित करता है। आध्यात्मिक चिंतन और भारतीय दार्शनिक परंपरा में रुचि रखने वालों के लिए यह लेख विचारणीय और ज्ञानवर्धक है।
- रजनीश शास्त्री, राष्ट्रीय कथावाचक, कटनी

आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करते हैं।
- पं. जगदीश शर्मा, ब्रह्मशक्ति ज्योतिष संस्थान

यह लेख “एकत्व का सृजन मार्ग” आध्यात्मिक, दार्शनिक और प्रतीकात्मक विचारों पर आधारित है, जिसमें स्त्री-पुरुष, प्रकृति-पुरुष और चेतना-ऊर्जा के संबंध को भारतीय दर्शन की दृष्टि से समझाने का प्रयास किया गया है। लेखक ने वेद, तंत्र और आध्यात्मिक अवधारणाओं का सहारा लेकर सृष्टि, जन्म और चेतना के रहस्यों को प्रतीकात्मक भाषा में प्रस्तुत किया है। लेख की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गहराई और भारतीय सांस्कृतिक चिंतन से जुड़ाव है।
- संजय दुबे, समाजसेवी, कटनी

आदरणीय गुलाब कोठारी जी का आलेख “एकत्व का सृजन मार्ग” पढ़कर लगा कि यह सिर्फ आध्यात्मिक विषय नहीं, बल्कि जीवन और स्त्री-पुरुष के संबंधों को बहुत गहराई से समझाने वाला चिंतन है। लेखक ने अग्नि और सोम जैसे प्रतीकों के माध्यम से सृजन और चेतना की जो व्याख्या की है, वह सामान्य लेखों से अलग और सोचने पर मजबूर करने वाली है। कुछ हिस्से गंभीर जरूर हैं, लेकिन पूरा लेख पढ़ने के बाद मन में एक अलग तरह की शांति और जिज्ञासा दोनों महसूस होती हैं। ऐसे विषयों पर आज के समय में इस तरह का चिंतन पढ़ने को मिलना सुकून देता है।
- श्रीमती विवेक पांडे, समाजसेवी, नरसिंहपुर

स्त्री-पुरुष, प्रकृति और सृष्टि रचना के गूढ़ आध्यात्मिक पक्ष को बेहद सुंदर और प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करता है यह लेख। भारतीय दर्शन के अनुसार संपूर्ण ब्रह्मांड अग्नि (ऊर्जा/तेज) और सोम (शीतलता/अमूर्तता) का संतुलन है। लेख में दोनों के आंतरिक और बाह्य स्वरूप के इस विरोधाभासी संतुलन को बहुत सलीके से रेखांकित किया गया है। सौम्य स्त्री का आग्नेय पुरुष में आहुत होना और स्थूल स्वरूप का नष्ट होना वास्तव में अहंकार के विलय और दो चेतनाओं के एकीकरण का प्रतीक है, जो एक नई रचना को जन्म देता है। आत्मा का सूर्य लोक से पुरुष के माध्यम से स्त्री के “दसवें द्वार” में प्रवेश करना, जीव के अवतरण की एक उच्च आध्यात्मिक व्याख्या है। आदरणीय कोठारी जी का यह लेख मात्र भौतिक मिलन को नहीं, बल्कि सूर्य-चंद्र के इस दिव्य योग को सृष्टि के शाश्वत नियम और नव-प्रादुर्भाव के मूल आधार के रूप में स्थापित करता है। यह चिंतन गहरा और अत्यंत विचारणीय है।
- इंजी. विनोद नयन, साहित्यकार, जबलपुर

पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी द्वारा लिखित लेख “एकत्व का सृजन मार्ग” केवल दार्शनिक चिंतन नहीं, बल्कि मानव जीवन के सृजन की भव्य यात्रा है, जिसे उन्होंने आध्यात्मिक रूप से प्रस्तुत किया है। यह सृजन मानव को भौतिकता से निकालकर समरसता की ओर ले जाने वाला गहन संदेश है। लेख में यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि सृष्टि का मूल तत्व “एकत्व” है, जबकि मनुष्य अपने अहं, भेदभाव और स्वार्थ के कारण स्वयं को प्रकृति और समाज से अलग मान बैठा है। लेख की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आध्यात्मिकता को व्यवहारिक जीवन से जोड़ा गया है। गुलाब कोठारी जी ने बताया कि जब व्यक्ति अपने भीतर और बाहर एक ही चेतना का अनुभव करता है, तभी सृजन संभव होता है। यही भाव भारतीय संस्कृति के “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “अहं ब्रह्मास्मि” जैसे सिद्धांतों में भी दिखाई देता है।
- महामंडलेश्वर डॉ. सुमनानंद गिरी, उज्जैन

जीव कई तत्वों से बना है। ब्रह्मांड में विद्यमान सभी सूक्ष्म और स्थूल तत्व जीव का आधार हैं। स्त्री और पुरुष भी इन्हीं तत्वों के प्रतीक हैं, जिनकी रचना ब्रह्मांड में सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। पुरुष और स्त्री मिलकर “एकत्व सृजन मार्ग” का अनुसरण करते हुए नए वातावरण का निर्माण करते हैं। गुलाब कोठारी जी ने भी कुछ इसी सार का इस लेख में विश्लेषण किया है।
- गोपाल कुमार माहौर, सेवानिवृत्त शिक्षक, श्योपुर

आज के लेख में कोठारी जी ने जीव के जन्म से ब्रह्म की यात्रा और प्राणी के स्थूल शरीर का सटीक उदाहरण प्रस्तुत किया है। वास्तव में अव्यय पुरुष का शरीर ब्रह्म और माया का क्षेत्र है। स्त्री से ही ब्रह्म का अंश प्रकट होता है। उसके भीतर अग्नि और बाहर सौम्यता है। प्रत्येक जीव माया के प्रभाव से कर्म करता है।
- रामानंद शर्मा, प्रोफेसर, भिंड

गुलाब कोठारी जी का यह लेख आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टि से बेहद ज्ञानवर्धक लगा। लेखक ने स्त्री-पुरुष, अग्नि-सोम और सृष्टि निर्माण के संबंध को गहराई से समझाने का प्रयास किया है। लेख की खासियत इसकी सरल और चिंतनशील भाषा है, जो पाठक को भारतीय दर्शन और चेतना के रहस्यों पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है। विशेष रूप से सृष्टि, आत्मा और ऊर्जा के संतुलन पर लेख का फोकस प्रभावशाली और मननीय है।
- प्रदीप होलकर, एडवोकेट, इंदौर

Updated on:
16 May 2026 07:16 pm
Published on:
16 May 2026 07:16 pm