24 deaths in road accidents in Jaipur in 22 days: जयपुर। राजधानी जयपुर की सड़कें अब सफर की नहीं, सीधे मौत की राह बनती जा रही हैं। शराब के नशे में धुत और तेज रफ्तार के जुनून में अंधे चालक रोज किसी न किसी की जिंदगी रौंद रहे हैं।
24 deaths in road accidents in Jaipur in 22 days: जयपुर। राजधानी जयपुर की सड़कें अब सफर की नहीं, सीधे मौत की राह बनती जा रही हैं। शराब के नशे में धुत और तेज रफ्तार के जुनून में अंधे चालक रोज किसी न किसी की जिंदगी रौंद रहे हैं। कहीं फुटपाथ पर खड़े ठेला कर्मियों को कुचला जा रहा है, कहीं सड़क पार करते मासूम तेज रफ्तार की भेंट चढ़ रहे हैं, तो कहीं विपरीत दिशा से दौड़ता वाहन पूरे परिवार की खुशियां उजाड़ देता है। हर हादसे के बाद एक घर का चिराग बुझ जाता है, कहीं मां-बेटी छिन जाती हैं तो कहीं परिवार का सहारा हमेशा के लिए चला जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन मौतों के सौदागरों पर कानून का खौफ क्यों नहीं है? कमजोर कानूनी शिकंजे और ढीली कार्रवाई की आड़ में आरोपी बच निकलते हैं और पीड़ित परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकता रह जाता है। जयपुर की सड़कों पर बहता खून और टूटते परिवार अब सिस्टम से जवाब मांग रहे हैं।
राजधानी जयपुर की सड़कों पर 1 से 22 जनवरी के बीच महज 22 दिनों में शहर के चारों पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण थाना क्षेत्र में 100 से अधिक सड़क हादसे दर्ज किए गए। इनमें 24 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। आंकड़े बताते हैं कि जयपुर पूर्व जिले में 22 दिनों के भीतर 27 सड़क हादसे हुए, जिनमें 9 लोगों की जान चली गई और 24 लोग घायल हुए।
जयपुर पश्चिम जिले में 28 हादसे दर्ज किए गए, जिनमें 7 मौतें हुईं और 26 लोग घायल हुए। उत्तर जिले में स्थिति भी गंभीर रही। यहां 11 सड़क हादसों में 5 लोगों की मौत हुई, जबकि 11 लोग घायल हुए। वहीं जयपुर दक्षिण जिले में सबसे ज्यादा 35 सड़क हादसे दर्ज किए गए। हालांकि यहां मौत का आंकड़ा 3 रहा, लेकिन 39 लोग घायल हुए, जो लापरवाही की भयावह तस्वीर पेश करता है।
सड़क दुर्घटना में तेज गति और लापरवाह या नशे में वाहन चलाने से हुई मौत को “सामान्य दुर्घटना” नहीं, बल्कि “गंभीर आपराधिक कृत्य” की तरह देखा जाना चाहिए। ऐसे मामले संज्ञेय व अजमानती होने चाहिए। अभी अधिकांश मामलों में पुलिस जमानती धाराओं में मामला दर्ज करती है। इसी वजह से आरोपी थाने से ही जमानत पर छूट जाता है और पीड़ित परिवार को लगता है कि न्याय मज़ाक बन गया है।
योगेन्द्र जोशी, सेवानिवृत्त आरपीएस
(अधिवक्ता मोहित खंडेलवाल के अनुसार)
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