
Role of Councilor: जयपुर: पार्षद को वार्ड की समस्याएं उठाने वाले जनप्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है। लेकिन निकाय व्यवस्था में उसकी भूमिका व्यापक है। निकाय कानून, नियम और विनिमय पार्षदों को विधायी, कार्यकारी, प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर कई जिम्मेदारियां और अधिकार देते हैं। वह सदन में प्रस्तावों पर चर्चा और मतदान के जरिए निकाय की नीतियों, विकास कार्यों की प्राथमिकताओं और बजट संबंधी फैसलों को प्रभावित करने में भी अहम भूमिका निभाता है।
नंबर 1: सदन में तय होती है प्राथमिकताएं- नगर निकाय की बैठक में पार्षद सार्वजनिक जरूरतों और विकास कार्यों से जुड़े प्रस्तावों पर चर्चा करते हैं। किसी सड़क, नाली, सार्वजनिक शौचालय या अन्य सुविधा का काम पहले कराया जाए। इस तरह की प्राथमिकताएं तय करने में उनकी भूमिका होती है। बहुमत के आधार पर नीतिगत प्रस्ताव पारित किए जाते हैं। बराबर मत होने की स्थिति में अध्यक्ष के निर्णायक मत का प्रावधान हो सकता है।
नंबर 2: समितियों में भी भूमिका- पार्षदों को विभिन्न समितियों के गठन और उनमें सदस्यों के चयन से जुड़ी भूमिका दी गई है। समितियों के माध्यम से अलग-अलग विषयों पर कामकाज और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी होती है।
नंबर 3: सफाई से सुविधाओं तक निगरानी- प्रशासनिक स्तर पर पार्षदों की भूमिका सार्वजनिक स्वास्थ्य, सफाई, बाजार और अन्य नागरिक सुविधाओं से जुड़े कामों की निगरानी तक रहती है। वार्ड में पानी की लाइन में लीकेज, गंदगी, प्रदूषण या सार्वजनिक सुविधा में खराबी सामने आने पर पार्षद इसे नगर निकाय के सामने उठा सकता है और कार्रवाई की मांग कर सकता है।
नंबर 4: सफाई बजट पर भी अधिकार- पार्षदों की महत्वपूर्ण भूमिकाओं में बजट पर चर्चा और उसे जुड़े प्रस्तावों पर भी इनकी भूमिका होती है। इसमें कर, शुल्क, जुर्माना - और किराए जैसे राजस्व स्रोत शामिल हो सकते हैं।
सभी पार्षद मिलकर नगर निकाय की निर्वाचित सभा बनाते हैं और नीतिगत फैसलों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।