
-जितेन्द्र सिंह शेखावत
राजपूताना में जयपुर ही ऐसी पहली रियासत रही जिसमें शिशु और महिला अस्पताल खुला और बाहर से चिकित्सकों को बुलाया गया। शिशुओं की मौत पर गुप्तचरों की खास नजर रहती। एक बार जयपुर के ब्रह्मपुरी में कुछ शिशुओं की मौत पर महकमा खास सहित पूरे प्रशासन में हड़कंप मच गया था।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी की जांच रिपोर्ट पर तसल्ली नहीं होने पर महाराजा माधोसिंह ( Sawai Madho Singh ) विश्वस्त अधिकारी खवास बालाबक्स के साथ औचक निरीक्षण करने ब्रह्मपुरी में बच्चों के घरों पर चले गए और उचित चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध करवा दी।
सांगानेरी दरवाजे के मेयो अस्पताल में सबसे पहले अजमेर से शिशु रोग विशेषज्ञ लगाने के लिहाज से मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. दलजंग सिंह खानका को अजमेर और शिमला भेजा गया। शिशु चिकित्सक का वेतन भी कोलकात्ता के वरिष्ठ सर्जन के बराबर दिया।
रियासत में तीन साल तक के शिशुओं की सूची बनती और महकमा खास यह सूची महाराजा को भेजता। हर बच्चे की पत्रावली बनती जिसमें जन्म व उसके स्वास्थ्य की पूरी जानकारी सरकार के पास रहती। वहीं बच्चे की मौत के कारणों की जांच कर विशेष पत्रावली बनाई जाती। जिसमें मृत्यु का कारण लिखा जाता। जच्चा-बच्चा को सर्दी-गर्मी से बचाव के लिए ऐलोपैथिक व आयुर्वेदिक दवाओं का घरों में नि:शुल्क वितरण होता।
किसी इलाके में शिशु की मृत्यु होती तब इलाके के हाकिम से जवाब-तलब होता। शहर में शिशु की मृत्यु की जानकारी जासूस अपने परचा खबर में महकमा खास को पहले देते।
बालानंद मठ से जुड़े देवेन्द्र भगत के मुताबिक किसी मोहल्ले में एक से ज्यादा शिशु की मौत पर चिकित्सको की टीम घरों पर जाकर दवाईयां देती। एक बार ज्यादा शिशुओं की मौत हुई तब मौज मंदिर सभा की सलाह पर आयोजित धार्मिक अनुष्ठान के तहत चौराहों पर नारियल पूजन करवाए। अंग्रेज अधिकारी ग्लांसी को शिमला भेजकर शिशु रोग विशेषज्ञों की टीम बुलवाई गई। जोबनेर के कर्णसिंह की अगुवाई में मोबाइल चिकित्सा दल ऊंटों पर बैठ गांवों में शिशुओं की चिकित्सा करता था।
जयपुर फाउंडेशन के सियाशरण लश्करी के पास मौजूद रिकार्ड के अनुसार सर मिर्जा इस्माइल ने रामगंज चौपड़ पर निवास करने वाली गौहर जान की हवेली को एक लाख चांदी के रुपयों में खरीद कर महिला एंव शिशु डिस्पेंसरी खोली। सन् 1942 की रिपोर्ट में मेयो अस्पताल एवं नाहरगढ़ रोड के महिला व शिशु अस्पतालों में डॉ. प्रेम प्यारी बर्नी के साथ यूरोपियन नर्सों ने शिशु व महिला चिकित्सा का बखूबी से काम किया।
सवाई मानसिंह ने सन् 1933 में महारानी किशोर कंवर की सलाह पर चांदपोल में जनाना अस्पताल खोला। मिर्जा इस्माइल के समय बच्चों के वार्डों में हीटर व इंप्यूवेटर उपकरण लगे और रियासत के 125 कस्बों और गांवों में डिस्पेंसरियां खोली गई। उन दिनों डॉ. एम एक्विनो, डॉ. गोनसाल्वर्स, डॉ. ई पीटर्स, डॉ. डी. गंजालविल, डॉ. पोस्तावाला, डॉ. लिलियन थॉम्पसन, डॉ.श्रवण लाल पुरोहित मशहूर चिकित्सक रहे।