जयपुर

Rajasthan : सीकर के ऑनर किलिंग और डबल मर्डर केस में राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, सभी आरोपी बरी, जानें क्यों?

Rajasthan High Court : जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर जिले के बहुचर्चित डबल मर्डर और ऑनर किलिंग से जुड़े मामले में अधीनस्थ कोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें एक आरोपी को मौत की सजा और अन्य को आजीवन कारावास समेत विभिन्न सजाएं सुनाई गई थीं। जानें पूरा मामला।
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Updated: 30 Oct 2026, 6:49 PM IST
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Rajasthan : फाइल फोटो पत्रिका।

Rajasthan High Court : जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने सीकर जिले के बहुचर्चित डबल मर्डर और ऑनर किलिंग से जुड़े मामले में अधीनस्थ कोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया है, जिसमें एक आरोपी को मौत की सजा और अन्य को आजीवन कारावास समेत विभिन्न सजाएं सुनाई गई थीं। न्यायाधीश महेंद्र कुमार गोयल और न्यायाधीश भुवन गोयल की खंडपीठ ने डेथ रेफरेंस को नामंजूर करते हुए सभी अपीलकर्ताओं/आरोपियों को आरोपों से बरी कर दिया है। इस बहुचर्चित मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने पुलिस अनुसंधान में पाई गई गंभीर, लापरवाह और साक्ष्य एकत्र करने में त्रुटियों को उजागर किया है। कोर्ट ने डीजीपी को राज्यभर के जांच अधिकारियों, थाना प्रभारियों और पर्यवेक्षक अधिकारियों के लिए उपर्युक्त पहलुओं पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के आदेश दिए हैं।

मामला ये है

सीकर जिले में 21-22 अक्टूबर 2019 की रात को गणपत लाल और प्रेम (जो कि मुख्य आरोपी रामगोपाल की पुत्री थी) की कथिततौर पर प्रेम प्रसंग के चलते हत्या कर दी गई थी। इस मामले में ट्रायल कोर्ट (अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संख्या-1, सीकर) ने 30 नवंबर 2024 को फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी रामगोपाल को मौत की सजा व अन्य 9 आरोपियों को आजीवन कारावास व अन्य कारावास से दंडित किया था। इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी, जिस पर खंडपीठ ने यह विस्तृत फैसला दिया है।

पुलिस की लापरवाही का कच्चा चिट्ठा

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में पुलिस जांच के हर स्तर पर पाई गई भारी चूक और कमियों को उजागर किया है। अदालत ने पाया कि मामले का मुख्य आधार सीसीटीवी फुटेज और डीवीआर थे, जिन्हें पुलिस ने अत्यंत लापरवाही से संभाला। रामगोपाल के घर और पेट्रोल पंप से जब्त किए गए डीवीआर और पेन ड्राइव बिना सील किए जब्त किए गए और उन्हें मालखाने में भी सही तरीके से जमा नहीं कराया गया। मालखाने के रजिस्टरों में प्रविष्टियों का भारी अभाव था और यह तक रिकॉर्ड में नहीं था कि डीवीआर कब बाहर निकाला गया और किसने इसका इस्तेमाल किया।

अभियोजन पक्ष साक्ष्यों की 'चेन ऑफ कस्टडी' को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। पेन ड्राइव और डीवीआर को बिना किसी फॉरेंसिक जांच के सीधे अदालत में पेश कर दिया गया। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य को साबित करने के लिए जो प्रमाण पत्र पेश किया गया, वह कानून के तय मानकों पर खरा नहीं उतरा। गवाह (उमेश कुमार) ने खुद स्वीकार किया कि पुलिस ने टाइप किया हुआ पत्र ला कर दिया और उसने केवल उस पर हस्ताक्षर कर दिए, जिससे उस प्रमाण पत्र की वैधता और विश्वसनीयता समाप्त हो गई। अदालत ने पाया कि निचली अदालत ने आरोपियों की पहचान के लिए गिरफ्तारी मेमो पर लगी तस्वीरों का आधार लिया, जबकि गवाहों ने स्वीकार किया कि तस्वीरें बाद में और अलग से विकसित कर जोड़ी गई थीं, जिन्हें कानूनन साबित नहीं किया गया था।

शुरुआती रिपोर्ट/शिकायत को दबाया

घटना की जानकारी मिलने के बावजूद पुलिस ने समय पर एफआईआर दर्ज नहीं की और खाटूश्यामजी थाने में दी गई शुरुआती रिपोर्ट/शिकायत को दबा दिया गया। कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, यदि वास्तविक शुरुआती शिकायत को छिपाया जाता है, तो पूरी जांच और एफआईआर संदिग्ध व 'पोस्ट-इन्वेस्टिगेशन डॉक्यूमेंट' बन जाती है। मृतकों के शवों की बरामदगी, हथियारों (केबल के टुकड़े) की जब्ती और खुलासे के बयानों में पुलिस अधिकारियों ने कानून के मुताबिक अभियुक्तों के सटीक शब्द अदालत में दर्ज नहीं कराए, जो साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत अनिवार्य है। इसके अलावा, बरामद की गई मिट्टी और अन्य नमूनों पर भी एफएसएल रिपोर्ट में खून का मिलान या स्पष्टीकरण नहीं मिल पाया।

कोर्ट ने जारी किए कड़े दिशा-निर्देश

करीब 1900-2000 साल पहले के कात्यायन स्मृति के श्लोकों का स्मरण करते हुए साक्ष्य एवं न्याय के महत्व को समझाया।
1- साक्ष्य को धर्म की आंख कहा गया है और यही न्याय प्राप्त करने का मुख्य साधन है। यदि किसी मामले में साक्ष्य न हो, तो सही निर्णय संभव नहीं होता।
2- सत्य का स्वभाव यह है कि उसका कभी नाश नहीं होता।
3- विद्वान न्यायाधीश को बिना साक्ष्य के किसी बात को स्वीकार नहीं करना चाहिए। कथन मात्र को प्रमाण नहीं माना जा सकता। जहां लिखित प्रमाण, साक्ष्य और तर्क-तीनों का समन्वय होता है, वहीं सत्य स्पष्ट होता है और न्याय निश्चित रूप से स्थापित होता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि डीजीपी, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 के अनुरूप इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों (विशेषकर सीसीटीवी फुटेज और कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स) के संकलन, जब्ती, संरक्षण और उन्हें साबित करने के लिए 2 महीने के भीतर एक मानक संचालन प्रक्रिया तैयार कर प्रसारित करें। इसमें सार्वजनिक या निजी सीसीटीवी स्रोतों की त्वरित पहचान करना और फुटेज सुरक्षित रखने के लिए लिखित मांग पत्र जारी करना। जहां संभव हो मूल स्टोरेज डिवाइस जब्त करना, अन्यथा मौके पर ही उसकी फॉरेंसिक कॉपी बनाकर उसकी 'हेश वैल्यू' को जब्ती मेमो में दर्ज करना। डिवाइस पर प्रदर्शित समय और वास्तविक समय के अंतर को नोट करना।

सर्विस प्रोवाइडर के नोडल अधिकारियों के माध्यम से सीडीआर, सब्सक्राइबर विवरण और सील बंद प्रमाण पत्र प्राप्त करना। डिवाइस या सिस्टम के वैध नियंत्रण वाले व्यक्ति से समकालीन रूप से धारा 63 (BSA, 2023) का प्रमाण पत्र लेना। साक्ष्यों की उचित सीलिंग, लेबलिंग, मालखाना प्रविष्टि और एफएसएल आने-जाने तक 'चेन ऑफ कस्टडी रजिस्टर' का मेंटेनेंस करना।

तीन महीने में प्र​शिक्षण

डीजीपी यह सुनिश्चित करेंगे कि राज्यभर के जांच अधिकारियों, थाना प्रभारियों और पर्यवेक्षक अधिकारियों के लिए उपर्युक्त पहलुओं पर आवधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। पर्यवेक्षक अधिकारी यह सत्यापित करेंगे कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर आधारित किसी भी मामले में चार्जशीट दाखिल करने से पहले एसओपी और कानूनी प्रावधानों की पूरी पालना की गई है या नहीं।

अभियोजन निदेशक, राजस्थान लोक अभियोजकों के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को अदालत में साबित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था करेंगे। अदालत ने इन सभी बिंदुओं पर संबंधित अधिकारियों को तीन महीने के भीतर अनुपालना रिपोर्ट हाईकोर्ट में प्रस्तुत करने का आदेश दिया है तथा इस निर्णय की प्रति प्रमुख शासन सचिव (गृह), डीजीपी, निदेशक अभियोजन और निदेशक राज्य एफएसएल को आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजने के निर्देश दिए हैं।

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30 Oct 2026, 6:49 PM IST
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