जयपुर

संपादकीय: पुलिस की संवेदनहीनता पर सख्ती दिखाता फैसला

हिरासत में किसी की भी मौत इस मूल अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
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Updated: 12 Apr 2026, 2:18 PM IST
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हिरासत में मौत का प्रकरण किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सिर्फ एक आपराधिक घटना ही नहीं, बल्कि संवेदनहीनता की पराकाष्ठा दिखाने वाला प्रसंग होता है। तमिलनाडु की एक निचली अदालत हिरासत में मौत के मामले में जब नौ पुलिसकर्मियों को मृत्युदंड की सजा सुनाती है तो उसकी पृष्ठभूमि भी पुलिस बल की ऐसी ही संवेदनहीनता को लेकर सख्ती दिखाने वाली होती है। फैसले को अंजाम तक पहुंचाना संविधान व कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में ही आता है, पर इतना निश्चित है कि अदालतों के ऐसे फैसले व्यवस्था के भीतर यही सख्त संदेश देते हैं कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। वर्ष २०२० में कोविड नियमों का उल्लंघन कर दुकान खोलने के आरोप में पुलिस वाले पिता-पुत्र को थाने में ले गए थे। वहां पुलिस की ओर से जोरदार पिटाई करने से दोनों की मौत हो गई। मामले ने तूल पकड़ा तो सरकार ने मामला सीबीआइ को सौंप दिया था।

फैसले में न्यायाधीश ने इस घटना को ऐसा दुर्लभ मामला माना, जिसमें कानून के रखवालों ने ही कानून का उल्लंघन किया। इस घटनाक्रम को दूसरे पहलू से देखें तो यह भी सही है कि हर वर्दीधारी गलत नहीं होता। देश की पुलिस व्यवस्था में हजारों अधिकारी और जवान ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, लेकिन जब हिरासत में मौत जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तो सवाल केवल एक थाने या कुछ कर्मियों तक सीमित नहीं रहते- पूरी व्यवस्था कठघरे में खड़ी हो जाती है। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि पुलिस कार्रवाई में राजनीतिक हस्तक्षेप और प्रश्रय की भूमिका पर गंभीर बहस हो। देश में ऐसे सैकड़ों उदाहरण सामने आ चुके हैं, जहां पुलिस की कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बताया गया। कई बार सत्ता के दबाव, स्थानीय प्रभाव या 'ऊपर' से मिले संकेत कानून की निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं। ऐसे में हिरासत में मौत के मामलों को केवल क्षणिक क्रोध या व्यक्तिगत आवेग का परिणाम मान लेना अधूरा विश्लेषण होगा। इसके पीछे संरचनात्मक दबाव, जवाबदेही की कमी और सत्ता-संबंधों की जटिलता भी हो सकती है। भारतीय संविधान हर नागरिक को गरिमा से जीवन जीने का अधिकार देता है। हिरासत में किसी की भी मौत इस मूल अधिकार का सीधा उल्लंघन है। यही कारण है कि ऐसे हर मामले की उच्चस्तरीय, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच अनिवार्य होनी चाहिए, ताकि सच्चाई के सभी पहलू सामने आ सकें- चाहे वह व्यक्तिगत दोष हो, संस्थागत विफलता या फिर राजनीतिक हस्तक्षेप।

सिर्फ सजा देना पर्याप्त नहीं है। पुलिस सुधार, प्रशिक्षण में संवेदनशीलता, थानों में निगरानी व्यवस्था और स्पष्ट जवाबदेही तंत्र जैसे कदम जरूरी हैं। साथ ही, राजनीतिक तंत्र को भी आत्ममंथन करना होगा कि कहीं उसका प्रभाव कानून के निष्पक्ष क्रियान्वयन में बाधा तो नहीं बन रहा। वर्दी का सम्मान तभी बचा रह सकता है, जब वह सत्ता के दबाव से मुक्त होकर केवल कानून और संविधान के प्रति जवाबदेह रहे।

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12 Apr 2026, 2:18 PM IST
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