जयपुर

घोटाला हो गया और जांच का पता नहीं

खरीद में छात्रावासों में रह रहे आदिवासी बच्चों का पेट भरने की जगह जिम्मेदारों ने अपना पेट भरने का काम खूब किया।

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Apr 23, 2026

राजस्थान विधानसभा में बजट सत्र के दौरान जनजाति छात्रावासों में बिना टेंडर खाद्य सामग्री खरीदने और अनियमितताओं पर सवाल उठ गया था। तब जनजाति क्षेत्रीय विकास मंत्री का जवाब था कि सहकारी उपभोक्ता भंडार के माध्यम से यह खरीद होनी थी, लेकिन दो माह बाद ही भंडार ने आपूर्ति करने से इनकार कर दिया। बच्चों को भूखा नहीं रख सकते थे इसलिए छात्रावास के वार्डनों को कह दिया था कि आप ही खरीदिए। शायद कुछ ने इसे 'आप भी खाइए' समझ लिया होगा। तभी तो महज दस हजार रुपए की तय सीमा से कहीं ज्यादा की खाद्य सामग्री खरीद ली गई, वह भी मनमाने दामों पर। सरकारी नियमों में साफ है कि एक निश्चित राशि से ज्यादा की खरीद टैंडर के जरिये की जानी चाहिए। हैरत की बात है कि केंद्रीय स्तर पर खरीद करने के बजाय संबंधित विभाग ने वार्डनों को ही सीधे खरीद करने के लिए कह दिया। सरकारी स्तर पर होने वाली हर खरीद में भ्रष्टाचार छिपा होता है इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। कहने को तो सरकार के निर्देश थे कि खाद्य सामग्री सहकारी उपभोक्ता भंडारों से ही खरीदी जाए, पर कुतर्क यह कि सहकारी उपभोक्ता भंडार दूर होने के कारण वार्डनों ने निजी दुकानों से खरीद कर ली। खरीद में छात्रावासों में रह रहे आदिवासी बच्चों का पेट भरने की जगह जिम्मेदारों ने अपना पेट भरने का काम खूब किया। तभी तो कहीं घी ५०० रुपए प्रति किलोग्राम तो कहीं ९०० रुपए प्रति किलोग्राम के भाव से खरीद लिया गया। शायद यह जानते हुए कि सरकारी खजाने में भुगतान में देर व अंधेर भले ही हो, पर पैसा अटकने वाला नहीं। सरकारी फरमान से ही मनमानी खरीद हुई है, तो जांच की आंच कई स्तर पर आने की आशंका रहने वाली है। इसलिए जांच कमेटी की औपचारिकता ही निभा दी गई। दोषी कौन है इसका आज तक पता नहीं चला। 70 करोड़ की खरीद का राशन किसके पेट में पहुंचा इसकी जांच तो हो और सीमा से अधिक भुगतान करने वालों के वेतन से आधिक्य वाली राशि वसूली जाए।

Published on:
23 Apr 2026 05:08 pm
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