
Bदावणगेरे.B श्री सुपाश्र्वनाथ जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जैनाचार्य राजरक्षितसूरि ने श्रद्धालुओं से आत्मकल्याण, संयम और धर्मसाधना को जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्वस्थ शरीर का सर्वोत्तम उपयोग तप, जप, स्वाध्याय, सेवा, संयम और साधना के माध्यम से आत्मा को सद्गुणों से विभूषित करने में है। आचार्य राजरक्षितसूरि ने बताया कि आषाढ़ शुक्ल चतुर्दशी से कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा तक का काल विरति पर्व अर्थात चातुर्मास कहलाता है। इस अवधि में विवाह जैसे मांगलिक कार्य नहीं किए जाते, बल्कि धर्म, तप, व्रत, स्वाध्याय, प्रवचन और आत्मचिंतन को विशेष महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि 28 जुलाई से 24 नवंबर तक पूरे भारत के जैन संघों में चातुर्मास की विविध धार्मिक गतिविधियां आयोजित होंगी। विशेष रूप से 8 सितंबर से प्रारंभ होने वाला पर्युषण महापर्व जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पर्व होगा, जिसमें आत्मशुद्धि, क्षमापना और तप की आराधना अपने चरम पर पहुंचेगी। धर्मसभा में चातुर्मास के प्रमुख कार्यक्रमों की भी घोषणा की गई। 28 जुलाई (चौमासी चौदस) को प्रात: 9 बजे प्रवचन होगा। 29 जुलाई (गुरु पूर्णिमा) को प्रात: 7.30 बजे "सद्गुरु शरणं मम" विषय पर विशेष प्रवचन तथा उसी दिन रात्रि 9 बजे "गुरुत्वं प्रणिदध्महे" विषय पर विशेष धर्मसभा आयोजित की जाएगी।