जयपुर

राजस्थान की वो 5 सीटें, जिन पर हुआ बड़ा उलटफेर, आया चौंकाने वाला परिणाम, जीतने वाले हार गए

Lok Sabha Election Results 2024: बाड़मेर में भाजपा के केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी को इतनी करारी शिकस्त झेलनी पड़ी कि वे तीसरे नंबर पर रहे।

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Jun 04, 2024

Lok Sabha Election Results 2024: राजस्थान में लोकसभा चुनावों के परिणाम चौंका देने वाले रहे। 10 साल बाद प्रदेश में कांग्रेस का सूखा खत्म हुआ और उसके खाते में सीटें आईं। इस बीच राजस्थान की पांच लोकसभा सीटों पर परिणाम चौंका देने वाले रहे। बांसवाड़ा, जालोर, बाड़मेर, नागौर और सीकर लोकसभा सीटों पर सामने आए परिणामों ने सभी को हैरान कर दिया। रविंद्र सिंह भाटी के निर्दलीय चुनावी मैदान में उतरने के बाद देश में बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट चर्चाओं में आ गई थी, लेकिन वहां भाटी की हार हो गई। यहां भाजपा के केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी को इतनी करारी शिकस्त झेलनी पड़ी कि वे तीसरे नंबर पर रहे।

बेटे को नहीं जिता पाए अशोक गहलोत

राजनीति के जादूगर कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने बेटे को जालोर-सिरोही लोकसभा सीट से जीत दर्ज नहीं करवा पाए। यहां गहलोत ने खुद प्रचार की कमान संभाली थी, लेकिन साधारण और स्थानीय लुंबाराम चौधरी के आगे पूर्व सीएम के बेटे की हाई प्रोफाइल छवि वाले वैभव गहलोत (Vaibhav Gehlot) नहीं टिक पाए। जालोर लोकसभा सीट पर बीजेपी ने स्थानीय बनाम बाहरी का मुद्दा बनाया, जिसका असर परिणामों में देखने को मिला। दरअसल कहा जा रहा है कि जमीनी स्तर पर वैभव गहलोत इतने एक्टिव नहीं थे, जबकि भाजपा उम्मीदवार लुंबाराम चौधरी यहां प्रधान रह चुके हैं। ऐसे में उन्हें स्थानीय छवि का बड़ा फायदा मिला।

क्यों हारे रविंद्र सिंह भाटी और कैलाश चौधरी

रविंद्र सिंह भाटी के निर्दलीय ताल ठोंकने के साथ ही सभी की निगाहें बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट पर थी। रविंद्र सिंह भाटी की रैलियों में युवाओं की भारी भीड़ उमड़ रही थी। इससे क्षेत्र में एक बार भाटी का माहौल बन गया था, लेकिन आरएलपी से कांग्रेस में आए उम्मेदाराम बेनीवाल ने भाटी को हरा दिया। माना जा रहा है कि रविंद्र सिंह भाटी (Ravindra Singh Bhati) ने भीड़ तो जुटा ली, लेकिन उसे वोटों में तब्दील नहीं कर पाए। वहीं केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी का अति आत्मविश्वास ही उन्हें तीसरे नंबर पर ले लाया। दरअसल चौधरी मोदी लहर के भरोसे थे, लेकिन राजस्थान में इस बार मोदी लहर नहीं चली। वहीं भाजपा नेता रविंद्र सिंह भाटी को भी मनाने में नाकाम रहे, जिसका खामियाजा चौधरी को भुगतना पड़ा। रविंद्र भाटी ने भी बीजेपी के कोर वोटर्स को तोड़ने का काम किया। इन सब कारणों से बीजेपी तीसरे स्थान पर खिसक गई।

भितरघात से हारीं ज्योति मिर्धा

विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान कांग्रेस का एक बड़ा चेहरा व पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा भाजपा में शामिल हो गईं, लेकिन नतीजा पिछला बार वाला ही रहा और वे चुनाव हार गईं। कहा जा रहा है कि नागौर में भितरघात से ज्योति मिर्धा को बड़ा झटका लगा है। भाजपा के कोर वोटर्स का वोट भी उन्हें नहीं मिला। उधर, हनुमान बेनीवाल (Hanuman Beniwal) को कांग्रेस का समर्थन मिला। कांग्रेस के नेताओं और समर्थकों ने बेनीवाल का साथ दिया और उनकी जीत पक्की कर दी। कहा जा रहा है कि ज्योति मिर्धा स्थानीय समीकरणों को साध नहीं पाईं।

बांसवाड़ा में मालवीय को लगा दोहरा झटका

बांसवाड़ा लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी महेंद्रजीत मालवीय को दोहरा झटका लगा है। मालवीय ने अपनी बागीदौरा विधानसभा सीट भी गवां दी, साथ ही लोकसभा चुनाव भी हार गए। यहां इस बार बीएपी का आदिवासी फैक्टर चला और राजकुमार रोत के आगे मालवीय टिक नहीं पाए। बांसवाड़ा लोकसभा सीट पर कांग्रेस और बीएपी का गठबंधन हो गया था। दोनों दलों ने सयुंक्त रूप से राजकुमार (Rajkumar Roat) को टिकट दिया। हालांकि इस बीच कांग्रेस से घोषित उम्मीदवार अरविंद डामोर ने नामांकन वापस लेने से इनकार कर दिया था। इससे मालवीय के चेहरे पर रौनक आ गई, लेकिन कांग्रेस के कोर वोटर्स राजुकमार की तरफ खिसक गए। राजनीति के दिग्गज कहते हैं कि बांसवाड़ा सीट पर बीजेपी आदिवासियों के मुद्दों को ठीक से समझ नहीं पाई और रणनीति बनाने में विफल रही। इसका खामियाजा मालवीय को उठाना पड़ा।

सीकर में भी उलटफेर

सीकर लोकसभा सीट की बात करें तो यह राजस्थान की वो सीट थी, जो कांटे की टक्कर वाली सीटों में से एक मानी जा रही थी। सीकर लोकसभा सीट से भाजपा से दो बार सांसद रह चुके सुमेधानंद सरस्वती मैदान में थे। उनके सामने सामने इंडिया गठबंधन ने यहां माकपा के दिग्गज नेता अमराराम को मैदान में उतारा। शुरू में ये चुनाव भाजपा के पक्ष में जाता लग रहा था, लेकिन समय के साथ माकपा ने अपनी पकड़ मजबूत की और मुकाबला जीत लिया। दरअसल भाजपा प्रत्याशी सुमेधानंद सरस्वती लगातार तीसरी बार चुनावी मैदान में थे और इनका कमजोर पक्ष एंटी इनकमबेंसी रहा। इसके अलावा चुनाव के समय जाट बोर्डिंग को लेकर सुमेधानंद सरस्वती ने जो बयान दिया था, उससे भी जाट समाज का एक वर्ग खासा नाराज था। इन दोनों चीजों का चुनावी नतीजों पर असर देखने को मिला।

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