
जैन दर्शन के शाश्वत सिद्धांतों का किया विवेचन
रायचूर। वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रायचूर के तत्वावधान में वर्षावास के दौरान आयोजित धर्मसभा में जैन समणी डॉ. सुयशनिधि ने कहा कि सम्यक् ज्ञान का आधार तत्त्व का यथार्थ बोध है। किसी वस्तु को केवल बाहरी स्वरूप से जान लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके वास्तविक स्वभाव और गुणों की पहचान ही सच्चा ज्ञान है।
उन्होंने भगवान महावीर द्वारा गौतम स्वामी को दिए गए ‘उप्पनेइ वा, विगमेइ वा, धुवेइ वा’ त्रिपदी उपदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि इसी आधार पर द्वादशांगी की रचना हुई और जैन ज्ञान परंपरा का विस्तार हुआ। जीव, पुद्गल, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाश और काल सहित षट् द्रव्यों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि जैन दर्शन केवलज्ञान और आत्मानुभूति पर आधारित शाश्वत सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है।
धर्मसभा के पश्चात 105 तपस्वियों को सोलह सती आराधना तप की विशेष क्रिया संपन्न कराई गई। इस अवसर पर 5 अगस्त को जयगच्छीय नवम् पट्टधर आचार्य जीतमल के जन्मदिवस पर भव्य कलश प्रतियोगिता आयोजित करने की जानकारी दी गई।