कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी किशोर प्रेम संबंधों में पॉक्सो के दुरुपयोग और इसके सामाजिक प्रभावों पर चिंता जताई थी। अब राजस्थान हाईकोर्ट ने भी उसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए केंद्र सरकार को गंभीर और तत्काल कदम उठाने का सुझाव दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिगों के बीच आपसी सहमति से बने संबंधों और पॉक्सो एक्ट के कठोर प्रावधानों के बीच के द्वंद्व पर एक सुझाव दिया है। जस्टिस अनिल कुमार उपमन की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और कानून निर्माताओं को सुझाव दिया है कि देश में अब 'रोमियो-जूलियट कानून' (Romeo-Juliet Law) की आवश्यकता है। कोर्ट ने साफ किया कि कठोर कानूनों का अंधाधुंध प्रयोग न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
हाईकोर्ट में एक युवक के खिलाफ दर्ज पॉक्सो एक्ट की FIR और कानूनी कार्यवाही को चुनौती दी गई थी। मामले में दलील दी गई कि दोनों पक्षों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे, लेकिन उम्र के तकनीकी अंतर (नाबालिग होने के कारण) की वजह से इसे गंभीर यौन अपराध की श्रेणी में डाल दिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रखर गुप्ता ने कोर्ट में प्रभावी पक्ष रखा। कोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए युवक के खिलाफ दर्ज FIR और चल रहे ट्रायल को पूरी तरह से रद्द करने के आदेश दिए।
अदालत ने टिप्पणी की कि पॉक्सो के तहत दर्ज होने वाले मुकदमों का एक बहुत बड़ा हिस्सा 'रोमियो-जूलियट' प्रकृति का होता है। इसमें अक्सर दो किशोर या एक किशोर और एक युवा आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं। लेकिन चूंकि लड़की की उम्र 18 वर्ष से कुछ महीने या दिन कम होती है, इसलिए कानूनन उसे 'यौन शोषण' मान लिया जाता है।
कोर्ट ने कहा कि कानून में ऐसी धारा (Romeo-Juliet Provision) जोड़ी जानी चाहिए जो यह अंतर कर सके कि वास्तव में शोषण कहाँ हुआ है और कहाँ मामला केवल आपसी सहमति वाले किशोर संबंधों का है।
जस्टिस अनिल कुमार उपमन ने अपने फैसले में कानून निर्माताओं को सख्त संदेश दिया। उन्होंने कहा, 'पॉक्सो जैसे कठोर कानून का उद्देश्य बच्चों को हिंसक यौन अपराधियों से बचाना है। यह कानून युवाओं को दंडित करने या सहमति से बने संबंधों को अपराध घोषित कर उनका भविष्य तबाह करने का हथियार नहीं बन सकता।'
अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इन कानूनों का अंधाधुंध प्रयोग जारी रहा, तो यह समाज में न्याय के बजाय अन्याय को बढ़ावा देगा।
उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी किशोर प्रेम संबंधों में पॉक्सो के दुरुपयोग और इसके सामाजिक प्रभावों पर चिंता जताई थी। अब राजस्थान हाईकोर्ट ने भी उसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए केंद्र सरकार को गंभीर और तत्काल कदम उठाने का सुझाव दिया है।
कोर्ट का मानना है कि किशोरावस्था के स्वाभाविक व्यवहार को अपराधीकरण की श्रेणी में डालना युवाओं के मानसिक और सामाजिक जीवन के लिए घातक है।