बिहार की राजनीति ने एक बार फिर से करवट ली है। या यूं कहें कि 90 के दशक में एक बार फिर से पहुंचती हुई दिखाई दे रही है। भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद बिहार में सरकार का जो स्वरूप सामने आया है। उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है।
बिहार की राजनीति ने एक बार फिर से करवट ली है। या यूं कहें कि 90 के दशक में एक बार फिर से पहुंचती हुई दिखाई दे रही है। भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद बिहार में सरकार का जो स्वरूप सामने आया है। उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है। लालू यादव ने बिहार में अपना राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने के लिए जिस मुस्लिम यादव गठजोड़ यानी माई समीकरण को आकार दिया था। इस बार के मंत्रीमंडल में एक बार फिर से वहीं समीकरण स्थापित होते दिखाई दे रहा है।
बिहार में मंगलवार को 31 मंत्रियों का शपथ ग्रहण राजद की मुस्लिम.यादव ;एमवायद्ध प्लस रणनीति को झलकाता हैए जबकि जदयू ने मंत्रियों के चयन में ओबीसी,ईबीसी,दलित,उच्च जाति के मेल को प्राथमिकता में रखा है। सीएम नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले नए मंत्रिमंडल में शामिल 31 मंत्रियों में से 16 राजद, 11 जदयू, 2 कांग्रेस व 1 हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के हैं। एक निर्दलीय विधायक को भी कैबिनेट में जगह दी है। अब सीएम और डिप्टी सीएम सहित 33 मंत्री हो गए हैं। मंत्रिमंडल में अधिकतम 36 मंत्री हो सकते हैं। सूत्रों के अनुसार विस्तार के बाद पांच विधायक नाराज हो गए हैं।
बिहार में नीतीश कुमार के साथ गठबंधन टूटने के बाद पहली बार भाजपा नेतृत्व के साथ राज्य कोर कमेटी की मंगलवार को यहां हुई बैठक में कई मुद्दों पर चर्चा हुई। पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की अध्यक्षता और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हुई बैठक में बिहार विधानसभा व विधान परिषद के नेता के चयन को लेकर विचार.विमर्श हुआ। आने वाले वक्त में बिहार इकाई में बड़े पैमाने पर फेरबदल के संकेत हैं। भाजपा नेतृत्व मिशन 2024 को लेकर संगठन में फेरबदल का बड़ा निर्णय ले सकता है। सामाजिक, जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर नेताओं का संगठन में समायोजन हो सकता है।