वन मण्डल डेजर्ट डिवीजन परियोजना क्षेत्र में इस वर्ष भी वैशाख पूर्णिमा पर वाटर हॉल पद्धति से वन्यजीव गणना संपन्न हुई।
वन मण्डल डेजर्ट डिवीजन परियोजना क्षेत्र में इस वर्ष भी वैशाख पूर्णिमा पर वाटर हॉल पद्धति से वन्यजीव गणना संपन्न हुई। यह प्रक्रिया 1 मई 2026 सायं 5 बजे से शुरू होकर 2 मई 2026 सायं 5 बजे तक लगातार 24 घंटे चली, जिसमें चयनित जलस्त्रोतों पर वन्यजीवों की गतिविधियों का निरंतर अवलोकन किया गया। गणना के दौरान चिंकारा, नीलगाय, जंगली बिल्ली, मरू बिल्ली, लोमड़ी और मोर जैसी प्रमुख प्रजातियों के वन्यजीव जल स्रोतों पर पानी पीते और आसपास विचरण करते दिखाई दिए। अनुकूल मौसम के कारण वन्यजीवों की आवाजाही सामान्य और सक्रिय रही, जिससे गणना के आंकड़ों की सटीकता बनी रही।
गणकों ने अलग-अलग स्थानों पर तैनात रहकर निर्धारित समयावधि में प्रत्येक गतिविधि को दर्ज किया। पूरी प्रक्रिया की मॉनिटरिंग डीएफओ कुमार शुभम ने की। उप वन संरक्षक कुमार शुभम के अनुसार गणना के लिए छह रेंज के अंतर्गत आने वाले 28 जलस्त्रोतों का चयन किया गया। इन स्थानों पर वन विभाग के फील्ड स्टाफ के साथ वन्यजीव प्रेमियों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई, जिससे गणना कार्य व्यवस्थित तरीके से पूरा हो सका। सभी टीमों ने समन्वय के साथ कार्य करते हुए निर्धारित मानकों के अनुसार आंकड़े संकलित किए।
-24 घंटे लगातार चली गणना प्रक्रिया
- छह रेंज में 28 जलस्त्रोतों का चयन
-विभिन्न टीमों की तैनाती और सतत निगरानी
-प्रमुख प्रजातियों की सक्रिय उपस्थिति दर्ज
-आंकड़ों का व्यवस्थित संकलन और विश्लेषण
गणना के अनुसार इस वर्ष कुल 2602 वन्यजीवों की मौजूदगी दर्ज की गई। इनमें नीलगाय की संख्या 616 रही, जो क्षेत्र में इस प्रजाति की स्थिर स्थिति को दर्शाती है। इसके अलावा चिंकारा, मोर और साण्डा जैसी प्रजातियों की संख्या भी अच्छी दर्ज की गई, जो मरुस्थलीय जैव विविधता के संतुलन का संकेत है। जानकारों के अनुसार वन्यजीवों की कुल संख्या पिछले वर्ष के समान स्तर पर बनी रहना क्षेत्र में स्थिर पारिस्थितिकी तंत्र को दर्शाता है। मरुस्थलीय क्षेत्रों में सीमित जल स्रोतों के कारण वाटर हॉल पद्धति को प्रभावी माना जाता है। इस पद्धति में जल स्रोतों पर आने वाले वन्यजीवों की उपस्थिति के आधार पर उनकी संख्या का आकलन किया जाता है, जिससे वास्तविक स्थिति का बेहतर अनुमान मिलता है।
उक्त गणना वन्यजीव संरक्षण, प्रबंधन रणनीतियों और भविष्य की योजनाओं के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। नियमित अंतराल पर इस प्रकार की गणना से वन्यजीवों की स्थिति पर निरंतर निगरानी बनी रहती है और आवश्यकतानुसार संरक्षण के कदम समय रहते उठाए जा सकते हैं।